यह चेतावनी इंडियन कैंसर सोसाइटी (ICS), दिल्ली ने विश्व कैंसर दिवस पर मंगलवार को एक मीडिया बातचीत में दी। इसी दौरान यूनियन बजट 2026-27 में कुछ कैंसर दवाओं पर कस्टम ड्यूटी में छूट देने और देश में ही बायोफार्मा कंपनियों को बढ़ावा देने की बात कही गई, ताकि इलाज लोगों तक आसानी से पहुंच सके।
हालांकि, बजट में दवाओं की कीमतें कम करने के उपायों का स्वागत किया गया, लेकिन पब्लिक हेल्थ एक्पर्ट्स ने कहा कि सिर्फ दवाओं को सस्ता कर देने से भारत में बढ़ते कैंसर के मामलों को पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता। खासकर तब जब बड़ी संख्या में मरीज बीमारी के बहुत गंभीर स्टेज में अस्पताल पहुंचते हैं।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
- ICS दिल्ली की चेयरपर्सन, ज्योत्सना गोविल ने कहा कि जहां तक संभव हो, कैंसर को होने से रोकना और उसका जल्दी पता लगाना सबसे जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘बजट से इलाज सस्ता होने का रास्ता खुला है, लेकिन हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज बीमारी के ऐसे स्टेज तक न पहुंचें जहां ये दवाएं ही उनका एकमात्र सहारा हों।’
- उन्होंने कैंसर की रोकथाम, मरीजों की मदद और उनके हक की लड़ाई में संगठन के लंबे समय से चले आ रहे कामों पर जोर दिया। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे जिम्मेदार मीडिया झूठी बातों को दूर करने, लोगों को समय पर जांच कराने के लिए प्रोत्साहित करने और समुदायों तक सही जानकारी पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
- मौजूदा रुझानों पर डेटा पेश करते हुए फोर्टिस मेमोरियल हॉस्पिटल के सीनियर डायरेक्टर (ऑन्कोलॉजी) डॉ. नितेश रोहतगी ने कहा कि उम्र के हिसाब से सही जांच, जल्दी बीमारी का पता लगाना और नई जांच तकनीकों से मरीजों के ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है और इलाज का कुल खर्च भी कम हो जाता है।
- पॉलिसी और और सिस्टम में कमियों को उजागर करते हुए, कैंसर से बचीं और नीति आयोग की पूर्व निदेशक डॉ. उर्वशी प्रसाद ने कहा कि अलग-अलग इलाकों में असमानता, कैंसर से जुड़े डेटा की कमी और पैसों की दिक्कतें अभी भी बीमारी का पता लगाने और इलाज में देरी का कारण बन रही हैं। उन्होंने केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और कैंसर देखभाल में लगातार सरकारी निवेश की जरूरत पर बल दिया।
- एक सर्वाइवर के तौर पर अपना अनुभव बताते हुए, ICS दिल्ली की सेक्रेटरी, रेनूका प्रसाद ने कैंसर के मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक बोझ के बारे में बात की। उन्होंने संगठन की समुदाय-केंद्रित पहलों के बारे में बताया, जिनमें बड़े पैमाने पर जांच कार्यक्रम, प्रशांति हीलिंग और पुनर्वास केंद्र, ‘राइज अगेंस्ट कैंसर’ ऐप के जरिए डिजिटल पहुंच और मरीजों की मदद के लिए किए जा रहे प्रयास शामिल हैं।
- यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के दायरे में कैंसर की रोकथाम को शामिल करने पर बात करते हुए, पब्लिक हेल्थ कंसल्टेंट और WHO की पूर्व अधिकारी डॉ. मोनिका पुरी ने कहा कि रोकथाम, जांच और इलाज की निरंतरता को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल किया जाना चाहिए ताकि सभी को समान रूप से स्वास्थ्य सुविधा मिल सके।
- उन्होंने कहा कि कैंसर को रोकने के लिए लोगों को जागरूक करना बहुत जरूरी है। जैसे, तंबाकू और शराब का सेवन न करना, स्वस्थ भोजन करना और नियमित व्यायाम करना। ये सब चीजें कैंसर के खतरे को काफी कम कर सकती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर भी कैंसर की शुरुआती जांच की सुविधाएं बढ़ाई जा सकती हैं, ताकि दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोग भी इसका फायदा उठा सकें।
- डॉ. रोहतगी ने बताया कि आजकल कई तरह की नई जांच मशीनें आ गई हैं, जिनसे कैंसर का बहुत जल्दी पता लगाया जा सकता है। जैसे, मैमोग्राफी (स्तन कैंसर के लिए), पैप स्मीयर (सर्वाइकल कैंसर के लिए) और कोलोनोस्कोपी (आंतों के कैंसर के लिए)। इन जांचों से बीमारी को बढ़ने से पहले ही पकड़ा जा सकता है और इलाज आसान हो जाता है।
- डॉ. उर्वशी प्रसाद ने कहा कि सरकार को कैंसर के इलाज के लिए एक राष्ट्रीय योजना बनानी चाहिए, जिसमें सभी राज्यों को शामिल किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि कैंसर के मरीजों के लिए बीमा योजनाओं को और बेहतर बनाना चाहिए, ताकि वे इलाज का खर्च आसानी से उठा सकें।













