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  • 33 महीनों से गर्त में फंसता जा रहा चीन, 30 साल में कभी नहीं हुआ ऐसा, दुनिया के लिए क्या संकेत?

    नई दिल्ली: अमेरिका के बाद चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी है लेकिन पिछले कई साल से वहां डिफ्लेशन की स्थिति बनी हुई है। वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में गिरावट को डिफ्लेशन कहते हैं। मतलब चीन की कंपनियां डिमांड से ज्यादा माल बना रही हैं और उन्हें कम कीमत पर सामान बेचना पड़


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    By Azad Hind Desk फरवरी 15, 2026
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    नई दिल्ली: अमेरिका के बाद चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी है लेकिन पिछले कई साल से वहां डिफ्लेशन की स्थिति बनी हुई है। वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में गिरावट को डिफ्लेशन कहते हैं। मतलब चीन की कंपनियां डिमांड से ज्यादा माल बना रही हैं और उन्हें कम कीमत पर सामान बेचना पड़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2025 की चौथी तिमाही में जीडीपी डिफ्लेटर में .07 फीसदी गिरावट आई। यह देशभर में कीमतों को मापने का पैमाना है। चीन में डिफ्लेशन के हाल-फिलहाल रुकने के संकेत नहीं हैं।

    जीडीपी डिफ्लेटर में लगातार 11वीं तिमाही में गिरावट आई है। यह कम से कम 30 साल में डिफ्लेशन का सबसे लंबा सिलसिला है। 2008 के वित्तीय संकट के दौरान देश में डिफ्लेशन की स्थिति केवल दो तिमाही तक रही थी। जनवरी में देश में प्रोड्यूसर प्राइस में 1.4 फीसदी गिरावट आई। इस तरह देश में फैक्ट्री इनफ्लेशन में लगातार 40वें महीने गिरावट रही है। देश में प्रॉपर्टी मार्केट संकट के कारण कंज्यूमर डिमांड पहले से ही काफी कमजोर है। कई जानकारों का कहना है कि चीन मंदी में फंस चुका है।

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    दुनिया के लिए चिंताजनक

    चीन में डिफ्लेशन के लंबे समय तक बने रहने की आशंका है। आमतौर पर जब इकॉनमी में फंड की सप्लाई और क्रेडिट में गिरावट होती है तो डिफ्लेशन की स्थिति पैदा होती है। इससे चीन की इकॉनमी में जापान की तरह ठहराव आने की आशंका जताई जा रही है। जापान की इकॉनमी एक जमाने में रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रही थी और माना जा रहा था कि वह अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। लेकिन डिफ्लेशन के कारण 1990 के दशक में जापान की इकॉनमी में ठहराव आ गया था। यही वजह है कि चीन में डिफ्लेशन पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक है क्योंकि वह पिछले कई दशक से ग्लोबल इकॉनमी का इंजन बना हुआ है।

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