पिछले हफ्ते आई एक रिपोर्ट्स में बताया गया था कि भारत के प्राइवेट सेक्टर को एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) बनाने के लिए पसंदीदा विकल्प माना जा सकता है। यह पांचवीं पीढ़ी का मल्टीरोल स्टील्थ हवाई जहाज है, जिसे देश की वायु सेना और नौसेना के लिए विकसित किया जा रहा है।
अगर ऐसा होता है, तो यह सरकार की रक्षा खरीद की सामान्य रणनीति से अलग होगा, जिसमें ऐसे विमानों, जैसे कि हल्के लड़ाकू विमान तेजस, के निर्माण के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि HAL के शेयरधारकों ने पिछले कुछ दिनों में अपने इरादे साफ कर दिए हैं। महीने की शुरुआत से स्टॉक की कीमत में लगभग 14% की गिरावट आई है। इस जटिल और महंगी कोशिश में प्राइवेट सेक्टर को शामिल करना सही दिशा में एक कदम है। लेकिन कुछ शर्तें जरूरी हैं-
चुनौतीपूर्ण राह
- रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) AMCA को डिवेलप कर रही है। तेजस फाइटर जेट जैसे मामलों में HAL एक सरकारी PSU होने के नाते एक बड़ा प्लेयर था, अब इसमें बदलाव होने की संभावना है।
- एयर वाइस मार्शल (रिटायर्ड) मनमोहन बहादुर का मानना है कि प्राइवेट प्लेयर्स को शामिल करना और एक और लाइन शुरू करना अच्छा होगा, क्योंकि HAL के ऑर्डर बुक तेजस विमानों के बड़े ऑर्डर से भरे हुए हैं।
- हालांकि, यह भारत के प्राइवेट प्लेयर्स के लिए एक मुश्किल बदलाव होगा। जबकि टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, L&T और भारत फोर्ज जैसी कंपनियों के नाम पांचवीं पीढ़ी के विमानों के इंटीग्रेशन और निर्माण के लिए शॉर्टलिस्ट में शामिल होने की बात चल रही है, इस तरह के प्रोजेक्ट्स के मामले में उनके पास अलग-अलग स्तर की विशेषज्ञता है।
- कुछ एयरबस और बोइंग जैसी कंपनियों की ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा हैं, कुछ अपनी हाई-प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं का इस्तेमाल तोपखाने के लिए करते हैं, जबकि कुछ ISRO, भारत की अंतरिक्ष एजेंसी के साथ रॉकेट बनाने के लिए काम कर रहे हैं। पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट का मुख्य इंटीग्रेटर और निर्माता बनना, अपनी जटिलताओं और रिडंडेंसी की जरूरत के साथ, मौलिक रूप से एक अलग तरह की चुनौती है।
- लेकिन ऐसा नहीं है कि प्राइवेट सेक्टर बिल्कुल खाली पन्ने से शुरुआत कर रहा है। जैसा कि रक्षा विश्लेषक अंगद सिंह बताते हैं, ये कंपनियां ग्लोबल मार्केट के लिए सप्लायर के तौर पर विमानों के कंपोनेंट और यहां तक कि पूरे सेक्शन भी बना रही हैं।
- मुख्य चुनौती उनके विजन के दायरे को बढ़ाना है। यह एक मुश्किल, बड़े दांव वाली भूमिका है जिसमें हाई-प्रिसिशन मैन्युफैक्चरिंग से कहीं ज्यादा काम शामिल है। इसमें जो कंपनी AMCA डील जीतेगी, वह ओवरऑल आर्किटेक्चर, सिस्टम इंटीग्रेशन, सेंसर के साथ सॉफ्टवेयर के तालमेल और एयरक्राफ्ट के लाइफसाइकिल के लिए जिम्मेदार होगी। यह साफ है कि प्राइवेट प्लेयर्स को कुछ मदद की जरूरत होगी।
पूरी क्षमता से हायरिंग की जरूरत
- हालांकि इसमें से कुछ मदद ADA और रक्षा मंत्रालय से मिलेगी, लेकिन बहुत कुछ उन लोगों पर निर्भर करेगा जिन्हें हायर किया जाएगा। पूर्व रक्षा सचिव जी मोहन कुमार कहते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट पाने वाले किसी भी प्राइवेट प्लेयर के लिए मुख्य चुनौती रिसोर्स और मैनपावर जुटाना है, यह ऐसे लोगों का पूरा इकोसिस्टम बनाने का सवाल है जो इसके पार्ट्स बना सकें। हमारे पास तेजस के लिए पहले से ही कुछ इकोसिस्टम मौजूद है।’
- इसका मतलब है, अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक चलता है, तो AMCA कॉन्ट्रैक्ट जीतने वाली मैन्युफैक्चरर कंपनी में बड़े पैमाने पर हायरिंग शुरू हो जाएगी। सिंह कहते हैं, ‘जो भी जीतेगा, वह मौजूदा इकोसिस्टम से खुलकर लोगों को लेगा। वे ऐसा क्यों नहीं करेंगे? सच्चाई यह है कि इंस्टीट्यूशनल मेमोरी खरीदी जा सकती है।’ यह सच में कोई ऑप्शन नहीं है। कुमार कहते हैं, ‘प्राइवेट सेक्टर इनोवेशन ला सकता है क्योंकि वे सबसे अच्छे लोगों को ला सकते हैं।’
HAL के लिए आगे क्या?
पूरे इकोसिस्टम में उम्मीद है कि प्राइवेट सेक्टर इस कॉन्ट्रैक्ट के जरिए अपनी दक्षता दिखाएगा। इस उम्मीद का कुछ हिस्सा रिटर्न दिखाने की जरूरत से आ रहा है। सिंह कहते हैं, ‘कॉन्ट्रैक्ट को कैसे भी मैनेज किया जाए, प्राइवेट सेक्टर को फाइनेंस कॉस्ट आएगी जो HAL को नहीं आती। HAL के पास बहुत ज्यादा कैश रिजर्व है और कोई अपॉर्चुनिटी कॉस्ट नहीं है क्योंकि यह कोई इनोवेशन वाली क्रिएटिव कंपनी नहीं है। उदाहरण के लिए, टाटा ₹5,000 करोड़ लगाकर यह उम्मीद नहीं कर सकता कि उसे अच्छा रिटर्न न मिले, क्योंकि वे इसे कहीं और भी लगा सकते थे।’













