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  • 65 दिन रहे साथ, 13 साल में एक-दूसरे पर किए 40 मुकदमे, कपल पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया तगड़ा जुर्माना

    नई दिल्ली: महज 65 दिन साथ रहे कपल ने 13 सालों में एक-दूसरे पर 40 मुकदमे दर्ज करा दिए। तलाक के मुकदमे की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कपल को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वे अदालतों को रणभूमि न बनाएं। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने दोनों पर 10 हजार


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    By Azad Hind Desk जनवरी 21, 2026
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    नई दिल्ली: महज 65 दिन साथ रहे कपल ने 13 सालों में एक-दूसरे पर 40 मुकदमे दर्ज करा दिए। तलाक के मुकदमे की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कपल को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वे अदालतों को रणभूमि न बनाएं। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने दोनों पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।

    मंगलवार को मुकदमे की सुनवाई के दौरान जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की बेंच ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल कर दोनों को तलाक दे दिया, लेकिन भविष्य में एक-दूसरे पर केस करने से मना कर दिया। बेंच ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘यह देखते हुए कि पक्षकार केवल 65 दिनों तक साथ रहे और एक दशक से अधिक समय से अनगिनत मुकदमेबाजी में लगे हुए हैं। जाहिर तौर पर हिसाब बराबर करने के इरादे से, हमारी राय में दोनों को जुर्माने के साथ दंडित किया जाना चाहिए, जिसकी राशि प्रत्येक के लिए 10,000 रुपये है। यह राशि सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन के पास जमा की जाए।’

    अदालतों को रणभूमि बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की बेंच ने आगे कहा, ‘ 13 सालों में उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से ज्यादा मुकदमे दायर किए हैं। झगड़ रहे जोड़ों को अदालतों को अपनी रणभूमि बनाकर सिस्टम को जाम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अगर अनुकूलता नहीं है, तो विवादों को जल्दी सुलझाने के तरीके उपलब्ध हैं। मध्यस्थता की प्रक्रिया वह तरीका है जिसे प्री-लिटिगेशन के चरण में और यहां तक कि मुकदमा शुरू होने के बाद भी खोजा जा सकता है।’

    अदालत ने कहा, ‘जब पक्षकार एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमा करना शुरू करते हैं, खासकर आपराधिक पक्ष पर, तो सुलह की संभावना कम होती है लेकिन इसे नकारा नहीं जाना चाहिए।’

    वैवाहिक मुकदमों की संख्या कई गुनों तक बढ़ी

    कोर्ट ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में वैवाहिक मुकदमों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। ऐसे में परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे मामला अदालत तक पहुंचने से पहले विवाद सुलझाने में मदद करें। बेंच ने कहा, ‘यहां तक कि यह अदालत भी ट्रांसफर याचिकाओं से भरी हुई है, जो मुख्य रूप से पत्नियों द्वारा दायर की जाती हैं, अपने पतियों द्वारा शुरू की गई कार्यवाही को ट्रांसफर करने की मांग करती हैं। ऐसी परिस्थितियों में, सभी संबंधितों, जिसमें पक्षकारों के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे कोई भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले विवाद को हल करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करें।’

    क्या है मामला?

    इस मामले में दोनों कपल की शादी जनवरी 2012 में हुई थी और 65 दिन बाद ससुराल छोड़कर चली गई थी। उसने अपने पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा क्रूरता का आरोप लगाया था। तब से वे अलग रह रहे हैं और दिल्ली और उत्तर प्रदेश के फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट में एक-दूसरे के खिलाफ कई मामले दायर किए हैं।

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