AI सिर्फ अमीरों की जागीर नहीं
अब तक जिसके पास ज्यादा डेटा और महंगी कंप्यूटिंग पावर थी, वही AI में आगे था। नई दिल्ली डिक्लेरेशन में ‘डेमोक्रेटाइजिंग AI रिसोर्सेस’ पर जोर देते हुए कहा गया कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्ती कनेक्टिविटी हर देश का अधिकार है। ‘चार्टर फॉर द डेमोक्रेटिक डिफ्यूजन ऑफ AI’ नाम का एक स्वैच्छिक फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया गया है, ताकि देश अपनी जरूरतों के हिसाब से AI विकसित कर सकें।
AI मॉडल्स की लाइब्रेरी
इसे एक वैश्विक साझा मंच की तरह समझिए। यहां अलग-अलग देशों के सफल AI मॉडल और उनके उपयोग के उदाहरण साझा किए जाएंगे। दूसरे देश उसे अपनाकर अपने यहां लागू कर सकेंगे। इससे समय और पैसा दोनों बचेगा। बार-बार नई रिसर्च पर खर्च करने की जरूरत कम होगी। ओपन-सोर्स AI को बढ़ावा देने से छोटे और विकासशील देशों को भी तकनीक अपनाने का मौका मिलेगा।
सुरक्षित और भरोसेमंद AI
समिट में ‘सिक्योर एंड ट्रस्टेड AI’ पर खास चर्चा हुई। ‘ट्रस्टेड AI कॉमन्स’ नाम के एक सहयोगी मंच का प्रस्ताव रखा गया है। यहां सुरक्षा से जुड़े टूल्स, मानक और बेहतर तरीकों को साझा किया जाएगा। कोई भी देश इनका उपयोग कर सकेगा। मकसद यह है कि AI का विकास जनहित को ध्यान में रखकर हो। भरोसे के बिना तकनीक टिक नहीं सकती, इसलिए नीति और तकनीक को साथ लेकर चलने पर सहमति बनी है।
विज्ञान और रिसर्च के लिए मंच
कई देशों के पास मजबूत रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, जिससे वे AI की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते। इसे दूर करने के लिए ‘इंटरनैशनल नेटवर्क ऑफ AI फॉर साइंस इंस्टिट्यूशंस’ का प्रस्ताव रखा गया है। इस नेटवर्क से अलग-अलग देशों की वैज्ञानिक संस्थाएं आपस में जुड़ सकेंगी। कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज खोजने से लेकर जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों तक, AI की मदद से शोध तेज हो सकता है।
सोशल एंपावरमेंट को आधार
समिट में इस बात पर जोर दिया गया कि AI का उपयोग समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने में हो। शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी सेवाओं तक पहुंच आसान बनाने के लिए AI आधारित समाधान विकसित किए जाएंगे। जैसे, कोई ग्रामीण नागरिक अपनी भाषा में AI सिस्टम से बात कर सरकारी योजना की जानकारी पा सकेगा। इससे दफ्तरों के चक्कर कम होंगे और सेवाएं तेज होंगी।
नौकरियों का क्या होगा
समिट में नौकरियों पर खतरे के बजाय AI को अवसर के रूप में देखा गया। ‘ह्यूमन कैपिटल’ पर जोर देते हुए स्किलिंग, री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग की बात की गई। ‘गाइडिंग प्रिंसिपल्स फॉर री-स्किलिंग’ और एक प्लेबुक के जरिए यह तय किया जाएगा कि युवाओं और कर्मचारियों को AI के अनुरूप कैसे तैयार किया जाए।
पर्यावरण के लिए क्या हुआ
AI सिस्टम को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली और संसाधनों की जरूरत होती है। इसे ध्यान में रखते हुए ऊर्जा-कुशल और टिकाऊ AI सिस्टम पर जोर दिया गया। ‘रेजिलेंट AI इंफ्रास्ट्रक्चर’ की प्लेबुक के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि तकनीकी प्रगति पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना हो। लक्ष्य यह है कि AI विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलें।
AI समिट से क्या हासिल हुआ?
समिट ने यह साफ संदेश दिया कि AI भविष्य की ताकत है, लेकिन इसे बराबरी और सहयोग के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। संसाधनों की साझेदारी, सुरक्षा पर जोर, रिसर्च में सहयोग, सामाजिक सशक्तिकरण और स्किल डिवेलपमेंट- इन सभी पहलुओं को जोड़कर एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश की गई है, जिससे AI का लाभ दुनिया के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।













