• National
  • कैथेड्रल चर्च का ब्रिटिश इतिहास, जहां क्रिसमस पर पहुंचे पीएम मोदी, ब्रिटिश वायसराय भी झुकाते थे सिर

    नई दिल्ली: क्रिसमस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ‘कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्प्शन’ में प्रार्थना सभा में भाग लिया। सभा में प्रार्थनाएं, क्रिसमस कैरोल्स और भजन गाए गए। दिल्ली के बिशप राइट रेवरेंड डॉ. पॉल स्वरूप ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए विशेष प्रार्थना की। प्रार्थना में भाग लेने के लिए दिल्ली


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk दिसम्बर 26, 2025
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    नई दिल्ली: क्रिसमस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ‘कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्प्शन’ में प्रार्थना सभा में भाग लिया। सभा में प्रार्थनाएं, क्रिसमस कैरोल्स और भजन गाए गए। दिल्ली के बिशप राइट रेवरेंड डॉ. पॉल स्वरूप ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए विशेष प्रार्थना की। प्रार्थना में भाग लेने के लिए दिल्ली और उत्तर भारत से बड़ी संख्या में ईसाई श्रद्धालु गिरिजाघर में उपस्थित रहे। जानते हैं इस ‘कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्प्शन’ का इतिहास

    ‘कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्प्शन’ दिल्ली के सबसे पुराने और ऐतिहासिक ईसाई गिरिजाघरों में से एक है। इसे जिसे वायसराय चर्च के नाम से भी जाना जाता है। यह चर्च लुटियंस दिल्ली में स्थित है, जो कि राष्ट्रपति भवन और संसद भवन के पास स्थित है। साथ ही यह उत्तर भारत के चर्च के दिल्ली डायोसीज का मुख्य कैथेड्रल भी है।

    कैसे हुई थी कैथेडल चर्च बनाने की शुरूआत?

    दिल्ली के इस चर्च का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है। दरअसल कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्प्शन के निर्माण की कवायद 1900 के आसपास शुरू हुई थी, जब ब्रिटिश राजधानी दिल्ली स्थानांतरित हो रही थी। ब्रिटिश अधिकारियों और इंग्लैंड से आने वाले उच्च स्तरीय अधिकारियों की धार्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक चर्च की आवश्यकता महसूस हुई।

    हेनरी मेड ने तैयार किया था डिजाइन

    ब्रिटिश अधिकारियों की आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए 1927 में तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन ‘कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्प्शन’ की नींव रखी। इस चर्च का डिजाइन ब्रिटिश आर्किटेक्ट हेनरी अलेक्जेंडर नेसबिट मेड ने तैयार किया था। यह डिजाइन वेनिस के पल्लाडियो के चर्च ऑफ इल रेडेंटोर से प्रेरित है, और लुटियंस दिल्ली की शैली में फिट बैठता है।

    इस चर्चा का निर्माण 1927 से 1935 तक चला। हालांकि इसे 18 जनवरी 1931 को सार्वजनिक पूजा के लिए खोला गया, और 15 फरवरी 1931 को लाहौर के बिशप ने इसे समर्पित किया। चर्च को वायसराय चर्च भी कहा है क्योंकि लॉर्ड इरविन यहां नियमित रूप से प्रार्थना करने आते थे और इस चर्च की नींव भी उन्होंने ही रखी थी।

    सफेद और लाल पत्थर से बना है चर्च

    यह चर्च धौलपुर के सफेद और लाल बलुआ पत्थर से बना है। इसमें ऊंचे मेहराब, गुंबददार छत, और अच्छी वेंटिलेशन है जो गर्मी में भी ठंडक बनाए रखती है। अंदर 1931 का ऐतिहासिक पाइप ऑर्गन है, और विभिन्न पेंटिंग्स हैं।

    1947 में भारत की आजादी के बाद, यह चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया (CNI) के दिल्ली डायोसीज का हिस्सा बना। यह चर्च दिल्ली की औपनिवेशिक विरासत का प्रतीक है, लेकिन अब यह विविध समुदाय का आध्यात्मिक केंद्र है। क्रिसमस और ईस्टर पर यहां विशेष उत्सव होते हैं।

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।