कम होगा टक्कर लगने से खतरा
इंटरेस्टिंग इंजीनियरिंग की रिपोर्ट (ref.) के अनुसार, स्टारलिंक सैटेलाइटों को नीचे लाने से उनकी टक्कर होने का खतरा कम होगा। याद रहे कि पिछले महीने एक स्टारलिंक सैटेलाइट में खराबी आने से उससे निकले थोड़े से मलबे के कारण सैटेलाइट का संपर्क टूट गया था और वह बर्बाद हो गया था। स्टारलिंक की पैरंट कंपनी स्पेसएक्स का कहना है कि सैटेलाइटों को धरती के नजदीक लाने का क्रम पूरे साल चलेगा। अंतरिक्ष में सैटेलाइटों की बढ़ती संख्या के कारण यह फैसला लिया गया है।
दुनियाभर से लॉन्च हो रहे सैटेलाइट
पृथ्वी की निचली कक्षा में दुनियाभर के देश सैटेलाइट पहुंचा रहे हैं। अकेले स्टारलिंक का लक्ष्य 10 हजार सैटेलाइटों का नेटवर्क तैयार करना है। इससे लो-अर्थ ऑर्बिट में भीड़ बढ़ रही है। वहां हर वक्त सैटेलाइटों के आपस में टकराने का खतरा बना रहता है। स्टारलिंक का कहना है कि नीचे की तरफ सैटेलाइटों की संख्या कम है। 500 किलोमीटर से नीचे कम सैटेलाइट होने के कारण उनमें टक्कर का खतरा कम हो जाता है।
सैटेलाइट नीचे रहने का एक और फायदा
अगर सैटेलाइट कम ऊंचाई पर रहकर पृथ्वी का चक्कर लगाता है और अपनी आयु पूरी कर लेता है तो वह जल्दी पृथ्वी के वायुमंडल में नीचे गिरकर खत्म भी हो जाता है। इससे बेकार सैटेलाइटों के अंतरिक्ष में दशकों तक चक्कर लगाने की चिंता नहीं रहती और नए सैटेलाइटों की राह आसान हो जाती है।
भारत में स्टारलिंक?
एलन मस्क की कंपनी भारत में भी अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं लॉन्च करने वाली है। इस साल 2026 में यह सर्विस शुरू हो सकती है। स्टारलिंक को सरकार से जरूरी मंजूरी मिल गई है और अभी कुछ तकनीकी काम बाकी हैं। स्टारलिंक के अलावा वनवेब, एमेजॉन कुइपर जैसी कंपनियां सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में काम कर रही हैं। हालांकि सबसे ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करके स्टारलिंक दुनिया में सबसे बड़ा ऑपरेटर बन गया है।














