सुनवाई की शुरूआत में एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने बेंच को बताया कि बुधवार को चार राज्यों ने इस मामले में अपने अनुपालन हलफनाने दाखिल किए है। दिल्ली जैसे शहरों में चूहों का गंभीर प्रकोप है और राष्ट्रीय राजधानी में बंदरों की भी एक बड़ी समस्या है। कुत्तों को अचानक – हटाने से चूहों की आबादी बढ़ेगी, जिसके दुष्परिणाम होंगे। तब जस्टिस मेहता ने -टिप्पणी की, ‘हल्के-फुल्के अंदाज में कहें तो कुत्ते और बिल्लियां दुश्मन है। बिल्लियां चूहों को मारती हैं। इसलिए हमें और बिल्लियों को बढ़ावा देना चाहिए?
एडवोकेट सिंह ने कहा कि वे कोर्ट के आदेशों पर पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। सिर्फ उन्हें पुनः देखने और उनमें आवश्यक संशोधन करने का अनुरोध कर रहे हैं। कुत्तों की संख्या स्टरलाइजेशन वैक्सीनेशन और फिर उसी इलाके में छोड़ने के तरीके से नियंत्रित की जाए। बेंच ने कहा, ‘हमें बताइए कि प्रत्येक अस्पताल में कितने कुत्तों को गलियारों में, वॉर्डों में और मरीजों के बेड्स के पास घूमने की अनुमति होनी चाहिए?
ABC के कमजोर अमल पर नाराज
कोर्ट को बताया गया कि कर्नाटक में 96 एबीसी ( एनिमल बर्थ कट्रोल) सेंटर होने के बावजूद आदेशों का पालन नहीं किया गया। जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की कि नगर निगमों ने इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए। बेच ने कहा कि आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने में ग्राम पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
IIT दिल्ली मॉडल का दिया हवाला
कोर्ट के सामने आईआईटी दिल्ली में लागू एबीसी मॉडल का हवाला दिया गया, जहां युद्धस्तर पर स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के बाद पिछले तीन वर्षों में रेबीज का कोई मामला सामने नहीं आया। कोर्ट को बताया गया कि माइक्रो-चिपिंग और जियो टैगिंग से कुत्तों की निगरानी आसान हो गई है।













