द कन्वर्शेन की एक रिपोर्ट कहती है कि आमतौर पर सरकारें अपने नागरिकों को कनेक्टिविटी से दूर करने के लिए दो तरीके अपनाती हैं। पहला है- रूटिंग डिर्स्पशन यानी रूटिंग में रुकावट पैदा करना और दूसरा है- पैकेट फिल्टरिंग।
क्या होता है रूटिंग डिर्स्पशन?
अगर कोई ऑटोनॉमस सिस्टम जैसे-इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर अचानक से इंटरनेट से अपने बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल रूट को हटा लेता है तो उसकी तरफ से कंट्रोल किया जा रहा आईपी अड्रेस का ब्लॉक रूटिंग टेबल से गायब हो जाता है। इससे अन्य ऑटोनॉसम सिस्टम उस प्रोवाइडर तक नहीं पहुंच पाते और सिस्टम का आईपी अड्रेस इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों की इंटरनेट कनेक्टिविटी टूट जाती है।
चलिए इसे और आसानी से समझते हैं-
इंटरनेट से जुड़ी हर डिवाइस चाहे आपका कंप्यूटर हो, स्मार्टफोन या अन्य गैजेट उसका एक आईपी अड्रेस होता है। आईपी अड्रेस ही नेटवर्क पर डेटा भेजने और उसे रिसीव करने में मदद करता है। यह आईपी अड्रेस, एक बड़े ऑटोनॉमस सिस्टम का हिस्सा होता है जिसका कंट्रोल किसी ऑर्गनाइजेशन या कंपनी के पास होता है। ऑटोनॉमस सिस्टम कुछ खास प्रोटोकॉल इस्तेमाल किए जाते हैं, जिन्हें बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल कहते हैं। जब कोई ऑटोनॉमस सिस्टम अचानक से अपने बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल रूट को हटा लेता है तो अन्य सिस्टम जैसे- आईपी अड्रेस उस तक नहीं पहुंच पाते और लोगों को इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं मिलती।
क्या होती है पैकेट फिल्टरिंग?
पैकेट फिल्टरिंग का इस्तेमाल किसी बड़े इलाके में इंटरनेट बंद करने के लिए नहीं होता। इसे इंटरनेट के कुछ खास हिस्सों को बंद करने के लिए यूज किया जाता है। उदाहरण के लिए किसी खास वेबसाइट को बंद करना। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ सरकारों ने डीप पैकेट इंस्पेक्शन तकनीक को भी इस्तेमाल करना शुरू किया है। इसमें भी पूरे इंटरनेट को ब्लॉक करने के बजाए कंटेंट को ब्लॉक किया जाता है। हालांकि जब प्रदर्शन उग्र हो जाते हैं और हालात नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं तो रूटिंग डिर्स्पशन ही सबसे कारगर तरीका हो सकता है।














