अनुभवहीन नेतृत्व पर तीखा प्रहार
हक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज खेल का नेतृत्व ऐसे लोग कर रहे हैं जिन्होंने कभी प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में बल्ला तक नहीं पकड़ा। उन्होंने सीधे तौर पर बीसीसीआई सचिव जय शाह और बांग्लादेश के वर्तमान खेल सलाहकार का उदाहरण दिया। हक के अनुसार, एक खेल सलाहकार द्वारा यह कहना कि बांग्लादेश को भारत नहीं जाना चाहिए, पूरी तरह से बेतुका है। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘यह विश्व कप है, आईपीएल नहीं। आईपीएल एक घरेलू टूर्नामेंट हो सकता है, लेकिन विश्व कप एक अंतरराष्ट्रीय गौरव का विषय है, जिसे राजनीतिक बयानों की बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।’
अनुभवी प्रशासक ने अतीत की याद दिलाते हुए कहा कि अगर आज जगमोहन डालमिया, माधवराव सिंधिया या एन. श्रीनिवासन जैसे परिपक्व लोग पद पर होते, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। उन्होंने 2008 के मुंबई हमलों के बाद के संकट का जिक्र करते हुए बताया कि वह स्थिति आज से कहीं अधिक नाजुक थी, लेकिन तब समझदार प्रशासकों ने मिलकर समाधान निकाल लिया था। हक ने कहा, ‘आज हमारे पास वह परिपक्वता नहीं है। वर्तमान खेल सलाहकार एक क्रांतिकारी और शिक्षक हैं, जिन्हें केवल दो महीने के प्रचार की परवाह है, क्रिकेट की नहीं।’
राजनीतिक कार्ड और चुनावी समीकरण
हक ने इस पूरे विवाद को सस्ती धार्मिक भावनाओं और चुनाव-संचालित राजनीति से प्रेरित बताया। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल और असम में होने वाले चुनावों में वोट हासिल करने के लिए राजनेता क्रिकेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि भारत और बांग्लादेश के संबंध भाइयों जैसे हैं और बीसीसीआई ने ही बांग्लादेश को टेस्ट दर्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में भारत-पाकिस्तान संबंधों की तुलना यहां करना गलत है। विवाद को सुलझाने के लिए हक ने सुझाव दिया कि मैचों को श्रीलंका स्थानांतरित कर देना चाहिए, जो एक जीत-जीत की स्थिति होगी। उन्होंने अंत में कहा कि यदि आईसीसी उनकी मांगों को नहीं मानता है और बांग्लादेश सरकार टीम भेजने से मना करती है, तो भले ही वित्तीय नुकसान हो, लेकिन राष्ट्रीय गौरव किसी भी आर्थिक हानि से कहीं ऊपर है।














