• National
  • पॉक्सो में रोमियो-जुलिएट क्लॉज जोड़ें, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से क्यों कही ये बात

    नई दिल्ली: बच्चों के यौन उत्पीड़न से संबंधित पोक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जैसा कोई प्रावधान लाया जाए। इसका मतलब है कि असली किशोर प्रेम संबंधों को इस कानून के सख्त नियमों


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk जनवरी 10, 2026
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    नई दिल्ली: बच्चों के यौन उत्पीड़न से संबंधित पोक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जैसा कोई प्रावधान लाया जाए। इसका मतलब है कि असली किशोर प्रेम संबंधों को इस कानून के सख्त नियमों से बाहर रखा जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट जमानत देते समय पीड़ित की उम्र का मेडिकल टेस्ट कराने का आदेश नहीं दे सकते।

    यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को पलटते हुए सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस संजय कारोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह शामिल थे। बेंच ने कहा कि बार-बार यह देखा गया है कि इन कानूनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए, इस फैसले की एक कॉपी भारत सरकार के कानून सचिव को भेजी जाए। कोर्ट ने सुझाव दिया कि इस समस्या को खत्म करने के लिए कदम उठाए जाएं। इसमें ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ लाना भी शामिल है, जो असली किशोर प्रेम संबंधों को इस कानून के शिकंजे से बचाएगा। साथ ही, एक ऐसा तरीका भी बनाया जाए जिससे उन लोगों पर मुकदमा चलाया जा सके जो बदले की भावना से इन कानूनों का इस्तेमाल करते हैं।

    हालांकि, बेंच ने इस कानून को ‘न्याय की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति’ बताया, जो आज के बच्चों और कल के नेताओं की रक्षा के लिए है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि Pocso एक्ट के तहत जमानत के समय पीड़ित की उम्र का मेडिकल टेस्ट कराने का इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्देश, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 (जमानत देना) के तहत उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

    बेंच ने फैसला सुनाया कि हाई कोर्ट जमानत देते समय ‘मिनी-ट्रायल’ (छोटी सुनवाई) नहीं कर सकते और न ही ऐसे जांच प्रोटोकॉल जारी कर सकते हैं जो मौजूदा कानूनों के खिलाफ हों। कोर्ट ने कहा, ‘पीड़ित की उम्र का पता लगाना मुकदमे का मामला है। दस्तावेजों को जो अहमियत दी गई है, उसे वहीं चुनौती दी जानी चाहिए, क्योंकि वही सही जगह है, न कि जमानत की सुनवाई में।’

    क्या है मामला?

    यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार की एक याचिका से जुड़ा है। सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एक आरोपी को जमानत दी गई थी। यह मामला एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न का था। जमानत देते समय हाई कोर्ट ने कई निर्देश दिए थे, जिनमें यह भी शामिल था कि Pocso एक्ट के हर मामले में पुलिस शुरुआत में ही पीड़ित की उम्र का मेडिकल टेस्ट कराए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने जमानत देने वाले हिस्से को ‘अपरिवर्तित’ रखा, यानी जमानत बरकरार रखी।

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।