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  • बारूद के ढेर पर बैठी है दुनिया, एक चिंगारी भड़का सकती है महायुद्ध, भारत भी अछूता नहीं

    नई दिल्ली: नए साल की शुरुआत हुई ही थी और जश्न का खुमार दुनिया पर चढ़ा ही हुआ था कि 3 जनवरी को अमेरिका ने वेनेजुएला पर स्ट्राइक की और सैन्य कार्रवाई करके वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ कर अमेरिका ले गए। अमेरिका ने इसे ऑपरेशन एब्सल्यूट रिजॉल्व नाम दिया


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    By Azad Hind Desk जनवरी 11, 2026
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    नई दिल्ली: नए साल की शुरुआत हुई ही थी और जश्न का खुमार दुनिया पर चढ़ा ही हुआ था कि 3 जनवरी को अमेरिका ने वेनेजुएला पर स्ट्राइक की और सैन्य कार्रवाई करके वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ कर अमेरिका ले गए। अमेरिका ने इसे ऑपरेशन एब्सल्यूट रिजॉल्व नाम दिया और कहा कि ये ऑपरेशन नारको-टेररिजम के खिलाफ है। ये इकलौता मिलिट्री एक्शन नहीं है जिसे इस वक्त दुनिया देख रही है। गाजा से लेकर यूक्रेन तक, कॉन्गो से लेकर सूडान तक दुनिया भर में कई संघर्ष चल रहे हैं। कहीं हवाई हमले और गोलाबारी जारी है तो कहीं बस एक चिंगारी भर की देरी है और वहां भी जंग की आग लग सकती है। दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां तनाव कभी भी युद्ध का रूप ले सकता है और हर युद्ध वैश्विक संकट में तब्दील हो सकता है। ऐसी स्थिति में आप हम भी इससे अछूते नहीं हैं। ये सबकी जिंदगी पर असर डालने की ताकत रखता है। किन देशों में चल रहे हैं संघर्ष और कौन देश खड़े हैं संघर्ष के मुहाने पर, आइए जानते हैं।

    दुनिया में ये देश डूबे हैं बारूद की गंध में

    रूस-यूक्रेन

    वैसे तो रूस-यूक्रेन के बीच संबंध 2014 में से ही बिगड़ने लगे जब रूस ने क्रीमिया को बलपूर्वक अपने कब्जे में ले लिया था। फिर 24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर स्ट्राइक कर दी और तब से रूस-यूक्रेन का युद्ध जारी है। रूस ने नाटो के विस्तार को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए कहा कि यूक्रेन अगर नाटो में शामिल होता है तो रूसी हितों के लिए खतरा है। अब तक इस जंग में रूस के 11 लाख से ज्यादा सैनिकों की या तो मौत हो चुकी है या घायल हैं। ये उस नुकसान से कहीं ज्यादा है जो अमेरिका को दूसरे विश्व युद्ध में हुआ था। इसी तरह यूक्रेन के भी 4 लाख से ज्यादा सैनिक या तो घायल हैं या मृत। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार पर्यवेक्षण मिशन के अनुसार यूक्रेन में अब तक करीब 15 हजार नागरिकों की मौत हुई है और करीब 38 हजार नागरिक जख्मी हुए हैं। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध खत्म करने के लिए अमेरिका भी बातचीत कर रहा है, शांति वार्ता की कोशिश चल रही है।

    इजरायल-हमास

    7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल पर अचानक हमला कर दिया। इसकी भनक तक इजरायली फोर्सेस को लग नहीं पाई थी। जिसके बाद 8 अक्टूबर 2023 को इजरायल ने युद्ध की घोषणा कर जवाबी हमला शुरू कर दिया। हमास ने इजरायल के नागरिकों पर हमला किया और बंधक भी बनाया। इजरायल ने गाजा पट्टी पर एयर स्ट्राइक, जमीनी हमलों के साथ सैन्य अभियान शुरू किया। इजरायल डिफेंस फोर्सेस के मुताबिक 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में करीब 1200 इजरायली मारे गए और सैकड़ों लोगों का अपहरण कर उन्हें गाज़ा ले जाया गया। साथ ही कहा कि हमारा एक ही लक्ष्य है- हमास की सैन्य और प्रशासनिक क्षमताओं को पूरी तरह समाप्त करना। गाजा हेल्थ मिनिस्ट्री के मुताबिक इजरायल-हमास संघर्ष में गाजा में 72 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे गए हैं। इजरायल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक 2100 से ज्यादा इजरायली मारे गए हैँ। गाजा में 78 पर्सेंट इमारतें या तो तबाह हो गई हैं या डैमेज हुई हैं। गाजा के आधे से ज्यादा इलाके में इजरायली फोर्स है। इजरायल और हमास के बीच पीस प्लान के पहले चरण में सहमति तो बनी है लेकिन अब भी वहां इजरायल डिफेंस फोर्सेस और हमास के बीच जंग जारी है।

    कॉन्गो-रवांडा

    कॉन्गो और रवांडा के बीच वैसे तो संघर्ष दशकों से चल रहा है लेकिन 2022 में फिर पूर्वी कॉन्गो में M23 विद्रोही समूह की गतिविधियां तेज ही। जनवरी 2025 में M23 ने कांगो के उत्तर किवु प्रांत की राजधानी गोमा और उसके बाद दक्षिण किवु का बुकेवु भी अपने कब्जे में ले लिया। यह एक जातीय संघर्ष है। जून 2025 में अमेरिका की मध्यस्थता में कांगो और रवांडा ने एक प्रारंभिक शांति समझौता पर हस्ताक्षर किए लेकिन ये पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। संघर्ष जारी है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक इसमें हज़ारों लोग मारे गए और 90 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।

    सूडान

    सूडान में वहां की राष्ट्रीय सेना (SAF) और अर्ध सैनिक बल (RSF) के बीच संघर्ष चल रहा है। 15 अप्रैल 2023 को सूडान में SAF और RSF के बीच हिंसक संघर्ष शुरू हुआ जब RSF ने कुछ शहरों में सैन्य गतिविधि बढ़ा दी। ये संघर्ष एसएएफ और आरएसएफ के बीच सत्ता और नियंत्रण को लेकर है। इसमें अब तक करीब डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए हैं। इस संघर्ष को दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक माना जा रहा है। पिछले साल नवंबर में अमेरिका ने मानवीय सीजफायर का प्रस्ताव रखा, जिसे आरएसएफ ने स्वीकार किया, ताकि मानवीय सहायता पहुंच सके। लेकिन सूडानी सेना का कहना है कि आरएसएफ के आत्मसमर्पण के बिना ये युद्ध खत्म नहीं होगा।

    अमेरिका-कोलंबिया

    3 जनवरी को अमेरिका ने वेनजुएला पर मिलिट्री स्ट्राइक की। इसे ऑपरेशन एब्सल्यूट रिजॉल्व का नाम दिया गया और कहा गया कि ये नारको टेररिजम के खिलाफ है। अमेरिकी की मिलिट्री वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को और उनकी पत्नी को पकड़ कर ले गई। वेनेजुएला पर स्ट्राइक के बाद ट्रंप ने कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेत्रो को चेतावनी दी और कहा कि वे अपनी जान बचा लें। वेनेजुएला का पड़ोसी देश है कोलंबिया, जहां तेल के विशाल भंडार है।

    अमेरिका-ग्रीनलैंड

    अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर मिलिट्री स्ट्राइक के बाद कहा कि हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। अमेरिका के पास पहले से ही ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा ‘पिटुफिक स्पेस बेस’ है। लेकिन ट्रंप यह पूरा द्वीप अमेरिका के क़ब्ज़े में चाहते हैं।

    थाइलैंड-कंबोडिया

    थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद लंबे वक्त से है। पिछले साल ये भयंकर संघर्ष में तब्दील हो गया। विवाद प्रिह विहार मंदिर और उसके आसपास के इलाके को लेकर है। जिस पर दोनों देश अपना दावा जताते हैं। शांतिपूर्ण समाधान के लिए ASEAN और चीन मध्यस्थता की कोशिशें कर रहे हैं लेकिन स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है।

    ईरान-अमेरिका

    ईरान में लगातार सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर और अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत हुई तो वहां के अधिकारियों को कड़ी सजा मिलेगी। पिछले साल ट्रंप ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने के बाद ईरानी शासन को आगे और कार्रवाई करने की धमकी भी दी थी।

    सऊदी-यमन

    यमन में 2014 से हूती विद्रोहियों और वहां की सरकार के बीच गृहयुद्ध चल रहा है। हूती को ईरान का समर्थन माना जाता है। 2015 में सऊदी अरब ने यमन सरकार की मदद के लिए सैन्य कार्रवाई शुरू की ताकि हूतियों को सत्ता पर काबिज़ होने से रोका जा सके। तब से सऊदी-यमन सीमा पर मिसाइल, ड्रोन और हवाई हमले होते रहे हैं। संघर्ष की तीव्रता कभी कम कभी ज्यादा होती रही है।

    यहां कोई भी चिंगारी बदल सकती है आग में

    चीन- ताइवान

    अमेरिका के ऑपरेशन एब्सल्यूट रिजॉल्व के बाद दुनिया भर में एक्सपर्ट की नजरें चीन-ताइवान पर हैं। ये चर्चाएं चलने लगी हैं कि चीन भी ताइवान पर ऐसा कोई अटैक कर सकता है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उस पर अपना दावा जताते रहा है। पिछले कुछ सालों में चीन ने ताइवान के चारों तरफ बड़े पैमाने पर मिलिट्री एक्सरसाइज भी की है। हालांकि एक्सपर्ट्स का ये कहना है कि इसकी संभावना कम है कि चीन तुरंत मिलिट्री एक्शन करेगा।

    भारत-पाकिस्तान

    पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब देने और पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को तबाह करने के लिए भारत ने पिछले साल मई में ही ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंक के 9 ठिकाने ध्वस्त किए। 6 मई की रात को ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च हुआ फिर पाकिस्तान की गुहार के बाद दोनों देशों के डीजीएमओ ने तय किया कि 10 मई की शाम पांच बजे से सभी फायरिंग और मिलिट्री एक्शन रोक देंगे। हालांकि भारत ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर जारी है। मिलिट्री कमांडर्स भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि ऑपरेशन सिंदूर ट्रेलर था और फिर जरूरत पड़ी तो तीनों सेनाओं की पूरी तैयारी है। आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी हाल ही में कहा कि जो भी आतंकवादियों को बढ़ावा देगा, हम उसे जवाब देंगे। हमारे पास अगर बैरंग चिट्ठी भी आई तो हमें पता है जवाब किसे देना है।

    क्या होता है हम पर असर

    विदेश मामलों के जानकार कमर आगा कहते हैं कि युद्ध कहीं भी हो उसका असर पूरी दुनिया में पड़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध का हमें यह नुकसान हो रहा है कि रूस से आ रहे तेल की सप्लाई बंद होती जा रही है। तेल नहीं आएगा तो कीमतें बढ़ेंगी और इकॉनमी पर सीधा असर होगा। रूस-यूक्रेन दोनों जगह से हमारी सेना को मिलने वाले हथियार और उपकरण की सप्लाई पर असर हुआ है। इसी तरह इजरायल-हमास संघर्ष का असर सिर्फ वहीं तक नहीं बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट में है। हमारे देश के कई लोग वहां हैं। मिडिल ईस्ट के देश सऊदी अरब, यूएई, इराक भारत के अहम एनर्जी पार्टनर हैं जो भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी करते हैं। सप्लाई पर असर पड़ने का मतलब है कि भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचता है। मिडिल ईस्ट में तनाव का असर पहले भी हिंद महासागर में समुद्री व्यापार (मेरीटाइम ट्रेड) पर भी दिखा, जहां हूती विद्रोहियों के हमले लगातार बढ़े थे। रेड सी के रास्ते आने वाले ट्रेड पर असर होने का सीधा मतलब है महंगाई। क्योंकि तब शिपमेंट लंबे रास्ते से होकर आएगा या जाएगा। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की संसद में विदेश मंत्रालय ने बताया था कि ‘संघर्ष के कारण कई देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने की संभावना है, खासकर सप्लाई चेन में रुकावट के ज़रिए। ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर इसका असर पहले ही दिखने लगा है’। कुल मिलाकर सभी युद्धों और संघर्षों का असर हम सब पर और हमारी जेब पर भी पड़ता है।

    आवाजाही पर असर

    जब ऑपरेशन सिंदूर चल रहा था तब भारत का एयर स्पेस बंद था। ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च होने से पहले ही सभी फ्लाइट को कैंसल कर दिया गया था। जिसका सभी लोगों पर असर हुआ और आवाजाही प्रभावित हुई। इजरायल-हमास संघर्ष में भी दिल्ली-तेल अवीव की सीधी उड़ाने पर कई बार असर हुआ। कई दिनों तक फ्लाइट रद्द रहीं। इस तनाव का असर पूरे मिडिल ईस्ट में भी रहा। ईरान, इराक और जॉर्डन के एयर स्पेस को भी कुछ वक्त के लिए बंद कर दिया गया था। जिससे भारत से यूरोप और अमेरिका जाने वाली इंटरनैशनल फ्लाइट का डायवर्जन हुआ और उन्हें लंबा रूट से जाना पड़ा। कई फ्लाइट कैंसल भी हुई। जब इजरायल ने ईरान पर मिसाइल हमले किए और पलटवार हुआ तब भी खाड़ी देशों ने अपना एयर स्पेस बंद कर दिया। इससे दुनिया भर की दो दर्जन से ज्यादा बड़ी एयरलाइंस को अपनी उड़ानें डायवर्ट करनी पड़ी या रद्द करनी पड़ीं। 2022 में जब रूस – यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो रूस ने पश्चिमी देशों की एयरलाइंस के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया, जिससे कई अमेरिकी और यूरोपीय एयरलाइनों को अपने फ्लाइट रूट बदलने पड़े। यह परेशानी आज भी बनी हुई है। इसका असर भारत से यूरोप आने-जाने वाली उड़ानों के समय, ईंधन लागत और टिकट की कीमत पर भी पड़ा है। दुनिया भर के सिविल एविएशन को देखें तो हर दिन एक लाख से ज्यादा कमर्शियल फ्लाइट संचालित होती हैं और इनमें एक करोड़ से ज्यादा यात्री उड़ान भरते हैं। युद्ध या संघर्ष सिविल एविएशन क्षेत्र को बाधित करने वाला सबसे बड़ा फैक्टर है। लंबी इंटरनैशनल फ्लाइट में इस्तेमाल होने वाले बड़े विमान अगर एक घंटा अतिरिक्त उड़ान भरते हैं तो इससे करीब 10000 डॉलर का अतिरिक्त खर्च आ जाता है।

    नए तरीके और मिला नया नजरिया

    इन युद्धों ने जहां नए तरीकों को दिखाया वहीं दुनिया भर की मिलिट्री को नया नजरिया भी दिया और उसी हिसाब से सबने तैयारी शुरू भी की। इजरायल पर हमले के लिए हमास के लोग ग्लाइडर से आए और एक साथ अटैक किया। ड्रोन और एंटी ड्रोन का जिस तरह इस्तेमाल हुआ उससे भारत सहित दुनिया भर की सेनाओं ने एंटी ड्रोन क्षमता बढ़ाने पर काम शुरू किया। सटीक अटैक कर इजरायल ने जिस तरह हिजबुल्लाह की पूरी लीडरशिप को खत्म किया उससे प्रिसिशन (सटीक) अटैक की क्षमता बढ़ाने की दिशा में भी सबने काम शुरू किया। हिजबुल्लाह के सदस्यों के पेजर जब एक के बाद एक फटने लगे तो इस तरफ भी दुनिया का ध्यान गया कि कितने लंबे वक्त से इसकी प्लानिंग की गई होगी। साथ ही जब हमास ने ताबड़तोड़ रॉकेट दागे और ये कहा जाने लगा कि इजरायल का आयरन डोम उसे संभाल नहीं पाया, उसके बाद से दुनिया भर में एयर डिफेंस पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। भारत ने भी एयर डिफेंस के लिए सुदर्शन चक्र मिशन पर काम करने का ऐलान किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी ड्रोन की जरूरत को रेखांकित किया वहीं लॉन्ग रेंज वेपन का जिस तरह इस्तेमाल हुआ, उससे भी दुनिया भर की मिलिट्री ने सीख ली। जहां पहले ये मान लिया गया था कि मौजूदा दौर में युद्ध 8-10 दिन से लंबा नहीं चलेगा वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध को देखते हुए अब पूरी दुनिया लंबे चलने वाले युद्ध की तैयारी के हिसाब से अपनी मिलिट्री को तैयार कर रही है।

    डिफेंस इंडस्ट्री की ग्रोथ

    संघर्ष और युद्ध जहां मानवीय संकट लेकर आते हैं वहीं ये डिफेंस इंडस्ट्री के लिए तेजी से बढ़ने का मौका होते हैं। इजरायल-हमास संघर्ष ने इजरायल की हथियार और सैन्य उपकरण बनाने वाली कई कंपनियों को नए प्रोजेक्ट दिलवाए वहीं रूस-यूक्रेन और दूसरे संघर्षों से सबक लेते हुए भारत ने भी तेजी से डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ाए। संघर्ष के माहौल में डिफेंस इंडस्ट्री सबसे तेजी से ग्रो करती है। ऑपरेशन सिंदूर के वक्त जब भारत और पाकिस्तान को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही थी कि किस देश के वेपन सिस्टम ने अच्छा प्रदर्शन किया, या किस एयरक्राफ्ट को नुकसान हुआ तो ये दरअसल चर्चा से ज्यादा अलग अलग देशों की डिफेंस इंडस्ट्री के बीच चलने वाला संघर्ष भी था और अपने प्रॉडक्ट बेचने की जंग भी।

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा मंत्रालय ने इंडियन आर्म्ड फोर्सेस के लिए कई खरीद को दी मंजूरी

    – 40 हजार करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद की पावर आर्म्ड फोर्सेस को दी गई मई 2025 में

    – 1.05 लाख करोड़ रूपये के सैन्य सामान और अपग्रेडेशन की जरूरत को जुलाई 2025 में मंजूरी

    – 67 हजार करोड़ रुपये के सैन्य सामान की खरीद की जरूरत को अगस्त 2025 में मंजूरी

    – 79 हजार करोड़ रुपये के सैन्य साजोसामान की खरीद की जरूरत को अक्टूबर 2025 में मंजूरी

    – 79 हजार करोड़ रुपये के सैन्य साजोसामान की खरीद की जरूरत को दिसंबर 2025 में मंजूरी

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