सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का इस्तेमाल सिर्फ जिद्दी अपराधियों की हिरासत बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसे सिर्फ इसलिए लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह आशंका है कि आरोपी जमानत मिलने के बाद अपनी आदतें नहीं सुधारेगा और दूसरा अपराध कर सकता है।
NDPS एक्ट के 3 मामलों का सामना कर रही है महिला
इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई आरोपी बेल पर रहते हुए कोई नया अपराध करता है तो इसे आम कानून के तहत बेल रद्द करके या ऊपरी अदालतों में बेल को चुनौती देकर निपटा जा सकता है। यह प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश देने का एकमात्र कारण नहीं हो सकता। इस मामले में जुड़ी आरोपी महिला NDPS एक्ट के तहत 3 मामलों का सामना कर रही है।
जमानत के बाद भी हिरासत में रखने का आदेश
मामले में आरोपी महिला न्यायिक हिरासत में थी, लेकिन हैदराबाद कलेक्टर ने उसे अपराध करने से रोकने के लिए जमानत मिलने पर भी हिरासत में रखने का आदेश दिया था। अथॉरिटी को शक था कि वह फिर से गांजा बेचने लगेगी, इसलिए उन्होंने कहा मुझे पूरा यकीन है कि आप आम कानून को नहीं मानेंगी, जब तक कि आखिरी उपाय के तौर पर, आम जनता के भले के लिए आपको हिरासत में रखने का सही ऑर्डर न दिया जाए।
सेहत को लेकर खतरा और डर- सुप्रीम कोर्ट
आरोपी ने तेलंगाना HC में इस आदेश को चुनौती दी, यह कहते हुए कि हिरासत का आदेश सिर्फ बेल रद्द करने के विकल्प के तौर पर पास किया गया था। HC ने उसकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के बार-बार और सोचे-समझे कामों से जनता में उनकी सेहत को लेकर खतरा और डर पैदा होने का अंदाजा लगाने के लिए काफी सबूत हैं। SC ने HC के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि हिरासत के आदेश में हिरासत देने वाले अधिकारी द्वारा इस संबंध में अपनी संतुष्टि दर्ज करना जरूरी है।













