सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा
पहले यह भ्रम था कि अगर बहू ससुर के जीते जी विधवा हो जाए तो उसे गुजारा भत्ता मिलता है, लेकिन ससुर की मौत के बाद वो विधवा होती है तो उसे गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को दूर कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यह अंतर करना गलत और बेतुका है। चाहे बहू ससुर के जीते जी विधवा हो या उनके मरने के बाद, दोनों ही सूरतों में वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।
विधवा बहू को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत
जस्टिस पंकज मित्तल और एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने कहा कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 22 के तहत किसी भी मृतक की संपत्ति से उसके आश्रितों का भरण-पोषण करना होगा। इसमें मृतक के वारिसों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे मरने वाले की संपत्ति से उसके आश्रितों का ख्याल रखें। इस धारा के तहत विधवा बहू भी आती है।
इस धारा के तहत SC ने सुनाया फैसला
शीर्ष कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी बेटे की मौत हो जाती है, तो उसके पिता (यानी ससुर) की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह अपनी विधवा बहू का भरण-पोषण करे। यह तभी लागू होगा जब बहू अपनी कमाई से अपना गुजारा नहीं कर पा रही हो। एक्ट में ऐसा कोई नियम नहीं है जो ससुर की इस जिम्मेदारी को खत्म कर दे, चाहे बहू उसके मरने से पहले विधवा हुई हो या बाद में।
मनुस्मृति का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हम इस कानून की छोटी या तकनीकी बातों में उलझकर विधवा बहू को गुजारा भत्ता देने से मना कर देंगे, तो वह बहुत मुश्किल में पड़ जाएगी और समाज में अकेली रह जाएगी। शीर्ष अदालत ने मनुस्मृति का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि किसी भी मां, पिता, पत्नी या बेटे को अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। ऐसा करने वाले को जुर्माना भरना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए।














