मर्डर के एक केस में एक शख्स को यह सब झेलना पड़ा। लेकिन अब केरल हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए शख्स को सुनाई गई सजा माफ कर दी है। यही नहीं हाईकोर्ट ने हत्या के इस मामले में जो गड़बड़ियां पाईं, उस पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल ही लगता है। आरोपी को शुरू से लेकर आखिरी तक निष्पक्ष जांच का मौका नहीं मिला। आखिर क्या है यह मामला? ट्रायल कोर्ट में कैसे हर कदम पर लापरवाही बरती गई, जानते हैं पूरी कहानी।
ओणम..दोस्ती और हत्या
18 सितंबर, 2011 को ओणम के मौके पर उत्सव का माहौल था। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक दो स्थानीय क्लबों ने इवेंट का आयोजन किया हुआ था, जिसमें कुछ लोग आपस में ताश खेल रहे थे। लेकिन जल्द ही उनमें झगड़ा शुरू हो गया और इनमें से एक की मौत हो गई। 24 सितंबर को आरोपी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। यूं तो उसे एक साल के बाद ही जमानत मिल गई, लेकिन 7 साल तक वो अंडर ट्रायल कैदी के रूप में जेल में ही रहा। अक्टूबर, 2019 में उसे हत्या का दोषी मान लिया गया।
वकील तक नहीं मिल पाया
शख्स को 7 साल से ज्यादा का लंबा इंतजार केस के शुरू होने के इंतजार में ही करना पड़ा। यही नहीं इस दौरान उसे एक वकील तक नहीं मिल पाया। जबकि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि आरोपी को वकील मिलना चाहिए। जमानत मिलने के बाद भी उसे आखिर क्यों न्यायिक हिरासत में रखा गया है, इसका जवाब भी ऑर्डर शीट से नहीं मिल पाया। कई मौकों पर तो उसे खुद ही अपना वकील बनना पड़ा।
100 से ज्यादा बार तारीख पर तारीख, जज ही बनी वकील
आरोप तय होने के बाद आरोपी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में 100 से ज्यादा बार सुनवाई को अगली तारीख तक के लिए टाला गया। हाईकोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाए क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने जिन वजहों से सुनवाई टाली, वो समझ से परे थी। यही नहीं ट्रायल कोर्ट में आरोपी की मौजूदगी के बिना ही कई बार सुनवाई और गवाहों के बयान दर्ज किए गए। हद तो तब हो गई, जब इस मामले में सरकारी वकील की गैर मौजूदगी में खुद महिला जज ने ही वकील की भूमिका निभा दी।
केरल ज्यूडिशियल एकेडमी में रखी जाएगी फैसले की कॉपी
इस केस में शुरू से लेकर आखिरी तक कई गड़बड़ियां हुईं। 2011 में हुए अपराध के लिए एक शख्स को 14 साल तक जेल में रहना पड़ा। इस दौरान जांच, ट्रायल और अपील सब हुआ, लेकिन उसे रिहाई नहीं मिली। केरल हाईकोर्ट ने अब इस मामले में नए सिरे से निष्पक्ष और सही ढंग से ट्रायल शुरू करने के निर्देश दिए हैं। यही नहीं कानून की पढ़ाई करने वालों के लिए इस फैसले की कॉपी केरल ज्यूडिशियल अकेडमी के निदेशक को भेज दी है ताकि भविष्य में इस तरह की गलतियां न हों।















