1- ईरान के नजदीक अमेरिकी सैन्य तैनाती कमजोर
ट्रंप लगातार ईरान के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। हालांकि, पेंटागन ने अभी तक ईरान के करीब कोई भी एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात नहीं किया है, जैसा कि वेनेजुएला के मामले में देखा गया था। पिछले साल इजरायल के साथ 12 दिनों के युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान की व्यापक घेराबंदी की थी और कम से कम दो एयरक्राफ्ट कैरियरों, एक लाख सैनिकों और एम्फीबियस असाल्ट ग्रुप को भी तैनात किया था। हालांकि, इतनी भारी-भरकम तैनाती के बावजूद अमेरिका ने सिर्फ स्टील्थ बमवर्षकों के जरिए हवाई हमला किया था और उसे भी सीधे अमेरिकी धरती से अंजाम दिया गया था।
2- अमेरिका के खाड़ी सहयोगी तैयार नहीं
अमेरिका के खाड़ी सहयोगी देश भी ईरान के खिलाफ हमले को लेकर अनिच्छुक हैं। ट्रंप की विदेश नीति से उन्हें भी डर है कि कहीं मुश्किल के समय अमेरिका उन्हें अकेला न छोड़ दे। इनमें जॉर्डन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और मिस्र जैसे देश शामिल हैं। हालांकि, इन देशों की अवाम भी यह नहीं चाहती है कि अमेरिका उनका इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए करे। ऐसे में ये देश अपने अवाम के विरोध से बचने के लिए अमेरिका से कन्नी काट रहे हैं और ईरान के खिलाफ हमले को लेकर उदासीन बने हुए हैं।
3- अमेरिकी हमले का उल्टा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो इसका उल्टा असर होगा। यह हमला सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरानी सरकार को घरेलू समर्थन जुटाने, आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को गैर-कानूनी ठहराने और बाहरी खतरे के खिलाफ क्षेत्रीय गठबंधनों को मजबूत करने में मदद करेगा। ऐसे में अमेरिका को इस हमले का अंजाम भुगतना होगा और ईरान में तख्तापलट की उम्मीदें पूरी तरह से टूट जाएंगी।
4- लॉजिस्टिक की समस्या
ईरान के आसपास के इलाके में पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी सैनिकों की संख्या में कमी आई है। इससे ट्रंप के लिए सैन्य विकल्प और कम हो गए हैं। अगर अमेरिका अभी से सैन्य तैनाती बढ़ाने का फैसला करता है तो उसे हफ्ते-दो हफ्ते का समय लग सकता है। इतने दिनों में ईरान विरोध प्रदर्शनों को बिलकुल दबा सकता है, जिसके बाद हमला करने का कोई मतलब नहीं बचेगा।
5- अमेरिका को सहना होगा पलटवार
ईरान ने भी चेतावनी दी है कि अगर हमला हुआ, तो वह भी इस क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा। हालांकि इज़राइल के साथ 12 दिन की लड़ाई में ईरान की मिलिट्री ताकत काफी कम हो गई थी। लेकिन, खबरों के मुताबिक ईरान ने सीमित मिसाइल क्षमता बनाए रखी है। ईरान के मुख्य लॉन्च साइट पहाड़ों में छिपे हुए हैं। ईरान इन्हें बड़े पैमाने पर विकसित कर रहा है। द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास लगभग 2,000 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो अगर बड़ी संख्या में लॉन्च की जाएं तो अमेरिका और इजरायल दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है।













