बता दें कि ईरान में करीब 2000 मेडिकल स्टूडेंट्स जम्मू और कश्मीर से हैं। बता दें इससे पहले तेहरान स्थित भारतीय एंबेसी ने एक दिन पहले ही एक एडवाइजरी जारी कर वहां मौजूद सभी भारतीयों को देश छोड़ने के लिए कहा था। इनमें छात्र, व्यापारी और टूरिस्ट, सभी को कहा गया था कि वो कमर्शियल फ्लाइट समेत ट्रांसपोर्ट के मौजूद तरीकों से ईरान छोड़ दें। इसके अलावा एंबेसी ने एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया था।
वहीं भारत में भी विदेश मंत्रालय ने लोगों को ईरान की गैर जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी थी। इससे पहले JKSA जैसे छात्रसंघ ने पीएम मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से गुहार लगाई थी कि वो वहां मौजूद छात्रों समेत दूसरे भारतीयों की सकुशल स्वदेश वापसी के लिए एक निकासी योजना बनाएं। इनका कहना था कि सरकार की ओर से छात्रों को जल्द से जल्द ईरान छोड़ने देने की सलाह दी गई लेकिन कोई इवैक्यूएश प्लान नहीं बनाया है। वहां के मौजूदा हालात में ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक जैसी समस्याों के लिए चलते लोगों को खुद वापस आने के लिए कहना ना सेफ है और ना व्यवहारिक। बता दें कि भारत में करीब दस हजार भारतीय मौजूद हैं।
क्यों भारत के लिए बैलेंस बनाना है मुश्किल?
- ईरान के हालात नाजुक हैं और कई देशों के नागरिक अपने अपने देशों की ओर लौट रहे हैं। भारत भी हालात पर नजर रखे हुए है और भारतीय नागरिकों को वापस लाने की तैयारी हो रही है . इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भारत का दौरा करने वाले थे, लेकिन फिलहाल स्थिति बिगड़ने के बाद ये दौरा अब नहीं हो रहा, लेकिन इस बीच उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर से बुधवार रात ईरान के हालात पर चर्चा की थी।
- ईरान की मौजूदा अस्थिरता में भारत के लिए कई रिस्क सामने हैं। जानकार मानते हैं कि चाहे इसका सीधे प्रत्यक्ष आर्थिक नतीजे भारत को ना झेलने पड़े, लेकिन इसके दीर्घकालिक असर पड़ना तय है। ईरान खुद Strait OF Hormuz और उसके समर्थक हूती लाल सागर पर नियंत्रण रखते हैं। ऐसे में अगर अमेरिका और इजरायल की ओर से कोई बाहरी हमला होता है और वहां हालात काबू से बाहर होते हैं, तो व्यापार प्रभावित हो सकता है। इस तरह की अस्थिरता मेरीटाइम ट्रैफिक पर असर डाल सकती है, शिपिंग इंश्योरेंस लागत बढ़ सकती है, जिससे कि तेल की कीमतों में इजाफा हो सकता है।
- एनर्जी सेक्योरिटी, भारतीय डायस्पोरा और चाबहार बंदरगाह की वजह से ईरान की स्थिरता का हमारे लिए बहुत महत्व है। भारत चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कोरिडोर अगर प्रभावित होता है तो इससे भारत की सेंट्रल एशिया में कनेक्टिविटी पर अस्थिरता से नया खतरा पैदा हो सकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार अनिल त्रिगुणायत कहते हैं कि ईरान में अगर अस्थिरता आती है तो हमारे लिए सही नहीं है। ऐसे मामलों में हमें अपनी वेस्ट एशिया नीति में स्थिरता के महत्व को प्राथमिकता देनी चाहिए। ये क्षेत्र हमारे लिए अहम हैं चाहे ये यूएई हो , या फिर सऊदी अरब, वेस्ट एशिया के ये देश हमारी विदेश नीति में खास जगह रखते हैं।
- ऐसे में भारत रणनीतिक ऑटोनमी की नीति को ही अपना रहा है। अमेरिका के साथ संबंधों की असहजा के चलते विदेश नीति में बैलेंस का मामला भारत के लिए लगातार चुनौती भरा बना हुआ है, लेकिन भारत सधी पगडंडी पर चल रहा है।













