प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक हालिया वर्किंग पेपर ने एक ऐसे पहलू पर भी ध्यान दिलाया है जो शायद उतना चर्चा में नहीं रहा, लेकिन आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यह है शहरी मास ट्रांजिट (सार्वजनिक परिवहन) का परिवारों के वित्तीय व्यवहार और कर्ज चुकाने की अनुशासन पर असर। यह पेपर बताता है कि मेट्रो कनेक्टिविटी से लोगों का आने-जाने का खर्च कम होता है और निजी वाहनों पर निर्भरता घटती है। इससे परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और वे वित्तीय रूप से ज्यादा स्थिर बनते हैं। इस पेपर को EAC-PM के पार्ट-टाइम सदस्यों सौम्या कांति घोष और पुलक घोष, और भारतीय स्टेट बैंक की अर्थशास्त्री फाल्गुनी सिन्हा ने लिखा है।
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क्या लिखा है रिसर्च पेपर में?
- पेपर के अनुसार जब लोगों को आने-जाने के लिए बेहतर और तेज सार्वजनिक परिवहन की सुविधा मिलती है, तो वे निजी वाहनों पर कम निर्भर होते हैं।
- इससे उनके आने-जाने का खर्च कम हो जाता है।
- यह खर्च कम होने से ईएमआई चुकाने का बोझ हल्का होता है, जो शहरी परिवारों के लिए सबसे बड़े निश्चित वित्तीय खर्चों में से एक है।
मोबिलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश से बदली स्थिति
पेपर में कहा गया है कि पिछले एक दशक में शहरी मोबिलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर (यानी आने-जाने की सुविधाओं) में किए गए निवेश, खासकर मेट्रो रेल के विस्तार से, परिवारों का नकदी प्रबंधन (लिक्विडिटी मैनेजमेंट) मजबूत हुआ है और उन्होंने कर्ज लेने में ज्यादा अनुशासन दिखाया है। पेपर में यह भी कहा गया है कि व्यवहार में ये सुधार परिवारों की वित्तीय मजबूती की एक महत्वपूर्ण नींव बनाते हैं और व्यापक वित्तीय स्थिरता में सार्थक योगदान देते हैं।
क्यों मायने रखता है आने-जाने का खर्च?
भारत में शहरी परिवारों को आमतौर पर बड़े फिक्स्ड वित्तीय खर्चों का सामना करना पड़ता है। इनमें सबसे बड़ा मासिक खर्च होम लोन की ईएमआई होती है। बेंगलुरु, हैदराबाद और दिल्ली जैसे शहरों में निजी वाहन रखने से जुड़े बड़े परिवहन खर्चों के कारण यह बोझ और बढ़ जाता है। व्हीकल लोन, पेट्रोल-डीजल का खर्च, इंश्योरेंस, मेंटेनेंस और पार्किंग, ये सब मिलकर डिस्पोजेबल इनकम (खर्च करने लायक आय) का एक बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।
वर्किंग पेपर में बताई गई मुख्य वजह बहुत सीधी है। जब लोगों को कुशल और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन की सुविधा मिलती है, तो वे निजी वाहनों पर कम निर्भर होते हैं। इससे उनके गाड़ी खरीदने, बार-बार पेट्रोल आदि जैसे खर्च कम हो जाते हैं। इससे हाथ में ज्यादा पैसा बचता है, जिससे परिवारों के लिए समय पर ईएमआई चुकाना आसान हो जाता है।













