सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि यह एक्ट 2012 में नाबालिगों को सेक्शुअल अब्यूज़ से बचाने के लिए लाया गया था। लेकिन आज इसका इस्तेमाल सहमति से बने टीनएज रिश्तों को क्रिमिनल बनाने या पर्सनल दुश्मनी निकालने के लिए किया जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक ऑर्डर से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल और एन कोटिश्वर सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून एक बेकार हथियार भी बन सकता है। ये उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है, जिनकी सुरक्षा के लिए इसे बनाया गया था।
पॉक्सो एक्ट की नैतिक और कानूनी ताकत बनी रहे
सुप्रीम कोर्ट (SC) की बेंच ने केंद्र से पॉक्सो के सबसे सख्त प्रावधानों से ‘जेनुइन किशोर रिश्तों’ को छूट देने के लिए ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज लाने पर विचार करने के लिए कहा। कोर्ट ने सहमति से बने करीबी उम्र के रिश्तों के लिए कानूनी छूट और कानून का गलत इस्तेमाल करके ‘बदला लेने’ वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही। बेंच ने इस बात का भी ध्यान रखा कि पॉक्सो एक्ट की नैतिक और कानूनी ताकत बनी रहे। कोर्ट ने कहा कि समस्या कानून के इरादे में नहीं, बल्कि इसे जमीन पर कैसे लागू किया जा रहा है उसमें है।
लड़के को कई महीने ऑब्जर्वेशन में बिताने पड़े
जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम में बच्चों के साथ काम करने वाली आशियाना फाउंडेशन की डायरेक्टर साची मनियार ने बताया कि एक मामले में 17 साल का लड़का और एक 16 साल की लड़की आपसी सहमति से रिलेशनशिप में थे। लड़के के परिवार ने इसका विरोध किया, लेकिन लड़की के परिवार ने आखिरकार उस जोड़े को अपना लिया। रिपोर्ट होने पर लड़के को कई महीने ऑब्जर्वेशन होम में बिताने पड़े। रिहाई के बाद वह जोड़ा लड़की के परिवार के साथ रहने लगा और अब दोनों दो साल के एक बच्चे की परवरिश कर रहे हैं। हालांकि, इस मामले का असर अभी भी जारी है। उनके बेटे को डॉक्यूमेंटेशन में दिक्कतों के कारण अभी भी स्कूल में एडमिशन मिलने में परेशानी हो रही है।












