सोने की बढ़ती कीमतों में भारत और चीन का भी बड़ा योगदान है। दोनों देशों ने अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड ( US Treasuries ) में अपना निवेश कम किया है और सोने की खरीद बढ़ाई है। यह सिर्फ कुछ समय के लिए पोर्टफोलियो में बदलाव नहीं है, बल्कि यह उनके रिजर्व मैनेजमेंट की रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है।
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आरबीआई की रणनीतिक चाल
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जो बदलाव आ रहा है, वो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अमेरिका के सरकारी कर्ज से हटकर दूसरे देशों में निवेश करने की सोची-समझी नीति का नतीजा है। अमेरिका के ट्रेजरी विभाग के आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर 2025 के अंत तक भारत का अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश 200 अरब डॉलर से घटकर करीब 190 अरब डॉलर रह गया। यह पिछले साल के मुकाबले 50.7 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट है।
इसी दौरान, आरबीआई ने सोने के मामले में बिल्कुल उल्टा कदम उठाया। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2025 के अंत तक केंद्रीय बैंक के सोने के भंडार बढ़कर 880.18 मीट्रिक टन हो गया, जो पिछले साल 866.8 मीट्रिक टन था। यह बढ़ोतरी तब हुई जब भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार करीब 685 अरब डॉलर पर लगभग स्थिर था। इससे लगता है कि यह भंडार में कुल बढ़ोतरी नहीं, बल्कि भंडार के अंदर ही सोने का हिस्सा बढ़ाया गया है।
सोना बना अहम हिस्सा
यह बदलाव भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने के बढ़ते हिस्से से साफ दिखता है। 26 सितंबर तक आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार का 13.6% सोना था, जो पिछले साल के 9.3% से काफी ज्यादा है। तब कुल भंडार रिकॉर्ड स्तर पर था। सोने का यह बढ़ता अनुपात दिखाता है कि सोना अब भारत की रिजर्व रणनीति का एक अहम हिस्सा बन गया है, न कि कोई मामूली संपत्ति।
चीन समेत बाकी देशों की क्या स्थिति?
यूके, बेल्जियम, जापान, फ्रांस, कनाडा और यूएई जैसे देशों ने अमेरिकी ट्रेजरी में अपना निवेश बढ़ाया है। जापान अभी भी सबसे बड़ा विदेशी धारक है, जिसके पास 1.2 ट्रिलियन डॉलर हैं, इसके बाद यूके और चीन का नंबर आता है। इसके विपरीत चीन, ब्राजील, भारत, हांगकांग और सऊदी अरब ने साल-दर-साल अपने निवेश को कम किया है।
चीन का अमेरिकी ट्रेजरी से निवेश कम करना और भी ज्यादा बड़ा और राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। अमेरिकी नवंबर 2025 में चीन का अमेरिकी सरकारी कर्ज में निवेश घटकर 682.6 अरब डॉलर रह गया, जो अक्टूबर में 688.7 अरब डॉलर था। यह साल 2008 के बाद का सबसे निचला स्तर है, जो अमेरिकी कर्ज से एक लंबे और लगातार पलायन को दर्शाता है। आधिकारिक मीडिया के अनुसार दिसंबर 2025 के अंत तक चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार था, जो कुल 3.3579 ट्रिलियन डॉलर था।














