फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार यूरोपीय देश अब 93 अरब यूरो तक के जवाबी उपाय तैयार कर रहे हैं। इसमें टैरिफ लगाना और अमेरिकी कंपनियों के लिए यूरोपीय संघ के बाजार तक पहुंच को बैन करना शामिल हो सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय संघ के राजदूतों ने ट्रंप को रोकने के लिए राजनयिक प्रयासों को तेज करने पर सहमति जताई है। साथ ही वे यूरोपीय संघ के कभी इस्तेमाल न किए गए एंटी-कोअरशन इंस्ट्रूमेंट जैसे जवाबी उपायों को भी तैयार कर रहे हैं।
सोना, चांदी, शेयर मार्केट… ग्रीनलैंड पर ट्रंप की धमकी से भारत को कैसे होगा फायदा?
टैरिफ बना ट्रंप का हथियार
यह घटना दिखाती है कि ट्रंप किसी भी देश के साथ ट्रेड डील कर लें। लेकिन यह डील उस देश पर भविष्य में लगने वाले टैरिफ से नहीं बचा सकती। टैरिफ ट्रंप का हर काम करने वाला हथियार बन गया है, जिसका इस्तेमाल वे व्यक्तिगत और भू-राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए करते हैं।
ट्रेड डील रोकने का दबाव
यूरोपियन पीपुल्स पार्टी (EPP) यूरोपीय संसद का सबसे बड़ा राजनीतिक ग्रुप है। इसके अध्यक्ष मैनफ्रेड वेबर ने कहा कि अमेरिका के साथ समझौता अब संभव नहीं है। वेबर ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘EPP ईयू-यूएस व्यापार सौदे के पक्ष में है, लेकिन ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों को देखते हुए, इस समय मंजूरी देना संभव नहीं है।’ उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क कम करने के यूरोपीय संघ के समझौते को रोक देना चाहिए।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने पिछली गर्मियों में ट्रंप के साथ जो EU-US व्यापार समझौता किया था, वह आंशिक रूप से लागू हो चुका है, लेकिन इसे अभी भी संसद की मंजूरी की आवश्यकता है। यूरोपीय संघ के सांसदों का एक मुखर समूह लंबे समय से इस समझौते के खिलाफ रहा है। उनका तर्क था कि यह अमेरिका के पक्ष में बहुत अधिक झुका हुआ है। जुलाई के समझौते के बाद अमेरिका ने स्टील और एल्यूमीनियम पर 50% टैरिफ को सैकड़ों अतिरिक्त यूरोपीय उत्पादों तक बढ़ा दिया, जिससे यह गुस्सा और बढ़ गया।
भारत ने क्या किया खेल?
अमेरिका भी भारत के साथ ट्रेड डील करना चाहता है। यह डील काफी लंबे समय से अटकी हुई है। ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिका को एग्रीकल्चर और डेयरी सेक्टर में एंट्री दे, जिसका दिल्ली में विरोध किया है। रूसी तेल को लेकर ट्रंप भारत पर कुल 50 फीसदी टैरिफ लगा चुके हैं। इसके बावजूद भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की तरह जल्दबाजी नहीं दिखाई।
भारत ने जल्दी ही वह पहचान लिया जो यूरोप अब सीधे तौर पर सामना कर रहा है। वह यह कि या समय सीमा के तहत हासिल किया गया सौदा अल्पकालिक दिखावा तो दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा बहुत कम। भारत के वार्ताकारों ने घबराहट के बजाय धैर्य चुना, यह दिखाते हुए कि रणनीतिक गहराई त्वरित समापन से अधिक महत्वपूर्ण थी।













