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  • ‘क्या बिगाड़ लिया मेरा, सुप्रीम कोर्ट से आदेश ले आया’…CJI सूर्यकांत ने खारिज कर दी अर्जी, कहा-जाइए माफी मांगिए

    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक एडवोकेट महेश तिवारी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया और उन्हें झारखंड हाई कोर्ट में बिना शर्त माफीनामा दाखिल करने को कहा। कोर्ट एडवोकेट महेश तिवारी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने कथित तौर पर झारखंड हाईकोर्ट की कार्यवाही बाधित


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    By Azad Hind Desk जनवरी 23, 2026
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    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक एडवोकेट महेश तिवारी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया और उन्हें झारखंड हाई कोर्ट में बिना शर्त माफीनामा दाखिल करने को कहा। कोर्ट एडवोकेट महेश तिवारी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने कथित तौर पर झारखंड हाईकोर्ट की कार्यवाही बाधित की थी। कार्यवाही बाधित करने के दौरान तिवारी ने कथित तौर पर कहा था कि ‘न्यायपालिका के कारण देश जल रहा है’ और ‘अपने तरीके से’ बहस करने पर अड़े रहे। एडवोकेट ने हाईकोर्ट को अपनी सीमा पार न करने की चेतावनी भी दे डाली थी।

    सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट की ओर क्या दलीलें दी गईं

    सुप्रीम कोर्ट में महेश तिवारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता झारखंड उच्च न्यायालय में कार्यरत वकील हैं। 16 अक्टूबर, 2025 को हाईकोर्ट की कोर्ट संख्या 24 में एक अप्रिय घटना घटी। इस घटना की सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से चर्चा हुई, जिसके परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध अवमानना का आपराधिक मामला स्वतः संज्ञान लेते हुए शुरू किया। इस नोटिस से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने यह अपील दायर की है। वरिष्ठ अधिवक्ता दवे ने कहा-मैं एक अन्य मामले का इंतजार कर रहा था… पांच न्यायाधीशों की नियुक्ति की, मानो मैंने कुछ बहुत बुरा कर दिया हो… कृपया देखें, ये वीडियो लीक करने वाले किसी भी व्यक्ति के माध्यम से वायरल हो गए।

    CJI सूर्यकांत की पीठ ने क्या आदेश दिया

    सु्प्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से क्षमा याचना पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने और उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने आदेश दिया-याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने विस्तार से स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता का माननीय न्यायाधीश का अनादर करने या न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता इस घटना के लिए अत्यंत पश्चातापी है और बिना शर्त क्षमा याचना करने को तैयार है। याचिकाकर्ता द्वारा लिए गए उपरोक्त रुख को ध्यान में रखते हुए, हम इस याचिका का निपटारा इस शर्त के साथ करना उचित समझते हैं कि याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय के समक्ष बिना शर्त क्षमा याचना का हलफनामा प्रस्तुत कर सकता है। हम उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि वह क्षमा याचना पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करे और उचित आदेश पारित करे।

    झारखंड हाईकोर्ट जाकर माफी मांगने में समस्या क्या है

    मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा-समस्या क्या है? वह क्यों नहीं जा सकता? यह फिर से उसके हठी स्वभाव को दर्शाता है… सभी पांच न्यायाधीश उसके लिए परिचित चेहरे हैं… तो वह जाकर पेश हो सकता है। अगर वह माफी मांगना चाहता है, तो माफी मांग सकता है। अगर वह सबके सामने अपनी आंखें दिखाना चाहता है, तो दिखा सकता है। फिर हम भी यहां देखेंगे। हम भी जानते हैं कि इससे कैसे निपटना है।

    ‘क्या बिगाड़ लिया मेरा, सुप्रीम कोर्ट से आदेश ले आया’।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आगे कहा-चूंकि मैंने भी वहां वकालत की है और वहां 15 साल से अधिक समय बिताया है। यह व्यक्ति वहां जाकर कहना चाहता है, ‘क्या बिगाड़ लिया मेरा, सुप्रीम कोर्ट से आदेश ले आया’। उन्होंने आगे कहा-देखिए, वह शांत भाव से बैठ सकते हैं। उन्हें आपके कक्ष में शांत मन से बैठना चाहिए। सोचिए और चर्चा कीजिए। बस सुनिए। अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है, तो उनमें नैतिक अधिकार और साहस होना चाहिए कि वे सम्मानपूर्वक जाकर इसका विरोध करें। दवे ने कहा-वह व्यक्ति 70 वर्ष का है, उन्होंने 40 वर्षों तक वकालत की है। अवमानना का मामला उनके सामने है, उनकी वकालत बर्बाद हो जाएगी।

    जस्टिस बागची ने क्या कहा

    जस्टिस बागची ने कहा-हम इस तरह के व्यवहार पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। लेकिन न्यायिक पदानुक्रम के हर स्तर पर ऐसी स्थितियां होती हैं जहां टकराव पैदा करना पेशेवर गौरव का विषय बन जाता है। दवे ने जवाब दिया-नहीं, नहीं। यह अहंकार नहीं है। मैं कह रहा हूं, मैं आप माननीय न्यायाधीशों से माफी मांग रहा हूं। इसे बंद कर दीजिए। उन्होंने आगे कहा-मूल न्यायाधीश को इससे कोई आपत्ति नहीं है। पांचों न्यायाधीशों, या माननीय मुख्य न्यायाधीश ने कुछ वीडियो देखे जो प्रसारित हो रहे थे। अदालती कार्यवाही के ये वीडियो अब एक खतरा बन गए हैं। इसलिए इसका संज्ञान लिया गया है।

    झारखंड हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया था

    झारखंड हाईकोर्ट ने आदेश दिया था-प्रथम दृष्टया हमारा यह मत है कि विपक्षी पक्ष के कथन आपराधिक अवमानना के अंतर्गत आते हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 215 और न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, हम रजिस्ट्री को विपक्षी पक्ष के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज करने का निर्देश देते हैं। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसे पीठ ने इस मामले का निपटारा कर दिया।

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