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  • कांग्रेस के अंदर चल रही गहरी बहस, क्या बंगाल में पार्टी को अकेले लड़ना चाहिए चुनाव

    लेखक: हेमंत राजौरापश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस एक बार फिर कठिन लेकिन निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। वर्षों तक लेफ्ट के साथ चुनावी गठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस अब उससे दूरी बनाने के संकेत दे रही है। यह केवल सीटों के बंटवारे या तात्कालिक चुनावी गणित का सवाल नहीं है, बल्कि कांग्रेस के भीतर


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    By Azad Hind Desk जनवरी 28, 2026
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    लेखक: हेमंत राजौरा
    पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस एक बार फिर कठिन लेकिन निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। वर्षों तक लेफ्ट के साथ चुनावी गठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस अब उससे दूरी बनाने के संकेत दे रही है। यह केवल सीटों के बंटवारे या तात्कालिक चुनावी गणित का सवाल नहीं है, बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रही उस गहरी बहस का नतीजा है, जिसमें पार्टी के पुनरुत्थान और संगठनात्मक अस्तित्व को लेकर चिंता साफ झलकती है।

    Vote Share में हुई जबरदस्त गिरावट

    कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन 2016 से बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहा। 2019 लोकसभा चुनाव में दोनों अलग हुए, लेकिन 2021 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में फिर साथ आए। हालांकि यह प्रयोग कांग्रेस के लिए लगभग हर बार नुकसानदेह ही साबित हुआ। 2021 विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। उसका वोट शेयर घटकर महज 3 प्रतिशत रह गया।

    Trinamool Congress के साथ क्या मिला

    इसके उलट, इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखती है। 1996 में कांग्रेस बंगाल में मुख्य विपक्ष थी। उसने 294 में से 288 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 82 सीटें जीतकर 39.48 प्रतिशत वोट हासिल किया। 2001 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ गठबंधन कर उसने केवल 60 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन 26 सीटें जीतने में सफल रही। 2011 में TMC के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने 42 सीटें जीतीं। 2016 में लेफ्ट के साथ मिलकर 44 सीटों पर जीत दर्ज की गई। लेकिन इसके बाद पार्टी का ग्राफ तेजी से गिरा। 2021 में 92 सीटों पर लड़कर शून्य पर सिमटना इस गिरावट की पराकाष्ठा थी।

    Congress का झंडा दिखाई नहीं दिया

    कांग्रेस के भीतर अब एक बड़ा वर्ग मानता है कि दो दशकों से गठबंधनों पर निर्भरता ने पार्टी को खोखला कर दिया है। राज्य के दो-तिहाई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का झंडा और चुनाव चिह्न वर्षों तक दिखाई ही नहीं दिया। ऐसे में संगठन का विस्तार, नए कार्यकर्ताओं का जुड़ना और मतदाताओं के बीच पार्टी की पहचान कैसे बने, यह सवाल लगातार उठ रहा है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राजनीतिक सुविधा छोड़कर कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का साहसिक फैसला लेना चाहिए, भले ही तात्कालिक नुकसान क्यों न हो।

    Bengal और Kerala का उदाहरण

    केरल का संदर्भ यहां अहम हो जाता है। वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF और वाम मोर्चा में सीधा मुकाबला है। BJP लंबे समय से इसी मुद्दे पर कांग्रेस को घेरती रही है कि वह बंगाल में लेफ्ट के साथ गठबंधन करती है, लेकिन केरल में उन्हीं के खिलाफ लड़ती है। हालिया लोकल बॉडी चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस केरल में किसी तरह का राजनीतिक जोखिम नहीं लेना चाहती। इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति की सोच पर भी पड़ रहा है।

    INDIA गठबंधन के बीच बातचीत नहीं

    विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के दो प्रमुख घटक होने के बावजूद कांग्रेस और लेफ्ट ने बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर अब तक कोई औपचारिक बातचीत नहीं की है। यह स्थिति 2021 से बिल्कुल उलट है, जब दिसंबर 2020 में ही दोनों ने साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। उस समय बना संयुक्त मोर्चा (संयुक्त मोर्चा) पूरी तरह विफल रहा। गठबंधन को सिर्फ एक सीट मिली, वह भी कांग्रेस या लेफ्ट को नहीं, बल्कि उनके जूनियर सहयोगी इंडियन सेक्युलर फ्रंट को।

    जमनी संघर्ष पर करना होगा काम

    इन अनुभवों ने कांग्रेस को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया है। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि अगर कांग्रेस को बंगाल में फिर से राजनीतिक प्रासंगिकता हासिल करनी है तो उसे लंबे समय तक संगठन निर्माण, जमीनी संघर्ष और स्वतंत्र पहचान पर काम करना होगा। इसके लिए अकेले चुनाव लड़ना कठिन जरूर है लेकिन शायद यही एकमात्र रास्ता है।

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