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  • Jaya Ekadashi Vrat Katha in Hindi: जया एकादशी व्रत कथा, इसके पाठ से अग्निष्टोम यज्ञ समान फल होगा प्राप्त

    Jaya Ekadashi Vrat Katha : माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पद्म पुराण में ‘जया’ का नाम दिया गया है। पुराण के अनुसार, जया एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने से पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है और इससे पापों का भी नाश होता है। इस एकादशी का व्रत करने के साथ-साथ


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    By Azad Hind Desk जनवरी 29, 2026
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    Jaya Ekadashi Vrat Katha : माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पद्म पुराण में ‘जया’ का नाम दिया गया है। पुराण के अनुसार, जया एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने से पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है और इससे पापों का भी नाश होता है। इस एकादशी का व्रत करने के साथ-साथ कथा का पाठ भी अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि जया एकादशी कथा का पाठ करने और इसे सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है। आइए जानें जया एकादशी व्रत की कथा पद्म पुराण से…

    जया एकादशी व्रत कथा
    युधिष्ठिर ने सवाल किया- भगवन, आपने माघ मास के कृष्ण पक्ष की ‘षट्तिला’ एकादशी के बारे में बताया है। अब कृपा करके मुझे बताइए की शुक्ल पक्ष में कौन सी एकादशी आती है? उसकी क्या विधि है और इस तिथि पर किस देवता की पूजा की जाती है?

    भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- राजेन्द्र! मैं जो बताता हूं उसे सुनो। माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का नाम ‘जया’ है। यह सभी पापों को दूर करने वाली उत्तम तिथि है। यह पवित्र होने के साथ-साथ पापों का नाश करती है और मनुष्यों को भोग और मोक्ष दिलाती है। यही नहीं, ब्रह्म हत्या जैसे पाप और पिशाचत्व का भी विनाश करती है। इसका व्रत करने से मनुष्य को कभी प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता है। इसलिए राजन, विधिपूर्वक ‘जया’ एकादशी का व्रत करना चाहिए।

    एक समय की बात है जब देवराज इंद्र स्वर्ग लोक में राज्य करते थे। देवगण पारिजात के वृक्षों से भरे नन्दन वन में अप्सराओं संग विहार कर रहे थे। पचास करोड़ गंधर्वों के नायक इंद्र ने स्वेच्छानुसार वन में विहार करते हुए बहुत ही हर्ष के साथ नृत्य का आयोजन किया था। वहां, गन्धर्व गान कर रहे थे, इनमें पुष्पदन्त, चित्रसेन तथा उसका पुत्र ये तीनों प्रधान थे। चित्रसेन की मालिनी नामक स्त्री थी। मालिनी द्वारा एक कन्या पुष्पवन्ती नाम से विख्यात हुई है। पुष्पदन्त गन्धर्व का एक पुत्र माल्यवान था जो पुष्पवन्ती के रूप पर अत्यंत मोहित हो गया था। ये दोनों भी इन्द्र के संतोषार्थ नृत्य करने आए हुए थे। दोनों का गान हो रहा था और इनके साथ अप्सराएं भी वहां थीं। परस्पर अनुराग के चलते दोनों मोह के वशीभूत हो गए। चित्त में भ्रान्ति आ गई। ऐसे में वे शुद्ध न गा पाए। कभी ताल भंग हो जाता तो कभी गीत बंद हो जाता है। इंद्र ने इस पर विचार किया और इसमें अपना अपमान समझकर वो कुपित हो गए थे।

    दोनों को श्राप देते हुए कहा- ‘ओ मूर्खों, तुम दोनों को धिक्कार है! तुम पतित और मेरी आज्ञा को भंग करने वाले हो। ऐसे में पति-पत्नी के रूप में रहते हुए पिशाच हो जाओ।’ इंद्र द्वारा ऐसा श्राप देने पर दोनों को बड़ा दुख हुआ। दोनों हिमालय पर्वत पर चले गए और पिशाच योनि को प्राप्त करके भयंकर दुख भोगने लगे। दोनों ही शारीरिक पातक से उत्पन्न ताप से पीड़ित होकर पर्वत की कंदराओं में विचरते रहा करते थे। एक बार पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाची से कहा- ‘हमने ऐसा कौन-सा पाप किया, जिससे हमें यह पिशाच-योनि प्राप्त हुई है? नरक का कष्ट अत्यंत भयंकर है और पिशाच योनि भी बहुत दुःख देने वाली है। ऐसे में हमें पूर्ण प्रयास करके पाप से बचना चाहिए।’ इसी तरह वे दोनों चिंतित होकर दुख के चलते सूखते जा रहे थे।

    दैवयोग से उन्हें माघ मास की एकादशी तिथि प्राप्त हुई। ‘जया’ नामक तिथि जो सभी में उत्तम तिथि है, वह आ गई। दोनों ने उस तिथि पर सभी प्रकार के आहार का त्याग कर दिया। यहां तक की जलपान तक नहीं किया। उस दिन दोनों से किसी जीव की हिंसा नहीं की और यहां तक की फल का भी सेवन नहीं किया। निरंतर दुख से एक पीपल के समीप दोनों बैठे रहे। सूर्यास्त का समय हो गया और उनके प्राण लेने वाली भयंकर रात उपस्थित हुई। दोनों को उस दिन नींद नहीं आ पाई, उन्हें रति या और कोई सुख भी प्राप्त नहीं हुआ। इसके पश्चात, सूर्योदय हुआ और द्वादशी का दिन आ गया। उन पिशाचों द्वारा ‘जया’ के उत्तम व्रत का पालन हो गया। दोनों ने रात में जागरण भी किया था। उस व्रत प्रभाव तथा भगवान विष्णु की शक्ति से दोनों की पिशाचता दूर हो गई। पुष्पवती और माल्यवान अपने पुराने रूप में वापस आ गए। उनके हृदय में वही पुराना स्नेह आ रहा था। उनके शरीर पर पहले ही जैसे आभूषण शोभा पा रहे थे। दोनों मनोहर रूप धारण कर विमान पर सवार हुए और स्वर्ग लोक की ओर चले गए। वहां, देवराज इंद्र के सामने दोनों बड़ी प्रसन्नता पूर्वक उन्हें प्रणाम किया। इंद्र को उन्हें उस रूप में उपस्थित देखकर बहुत विस्मय हुआ। इंद्र ने पूछा- किसी पुण्य के प्रभाव से तुम्हारा पिशाचत्व दूर हुआ यह मुझे बताओ? तुम दोनों को मैंने शाप दिया था फिर कैसे देवता ने तुम्हें उससे छुटकारा दिलाया?

    माल्यवान ने कहा- भगवान वासुदेव की कृपा और ‘जया’ नाम की एकादशी के व्रत से हमारी पिशाचता दूर हो पाई है।

    इंद्र ने कहा- तो अब तुम दोनों मेरे कहने पर सुधापान करो । जो एकादशी के व्रत में तत्पर और भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय होते हैं।

    श्रीकृष्ण कहते हैं- राजन! इसी कारण एकादशी का व्रत करना चाहिए | नृपश्रेष्ठ, ‘जया’ ब्रह्म हत्या का पाप भी दूर करने वाली होती है। जिसने ‘जया’ का व्रत किया हो उसने सभी प्रकार के दान दे दिए और संपूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया। इस महात्म्य का पाठ करने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

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