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  • Javed Akhtar on religion: सिर्फ धर्म ही नैतिक इंसान बनाता तो मिडिल ईस्ट में होती शांति, जावेद अख्तर ने ऐसा क्यों कहा

    नई दिल्ली। जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने एक बार फिर अपनी बेबाक राय रखी है। उन्होंने इस बार निजी अच्छाई और संगठित धर्म के बीच बारीक रेखा खींच दी है। वह वामपंथी लीडर शंकर दयाल तिवारी की याद में आयोजित एक सालाना समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा-धर्म और नैतिकता पर काफी बड़ी बातें


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    By Azad Hind Desk फरवरी 2, 2026
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    नई दिल्ली। जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने एक बार फिर अपनी बेबाक राय रखी है। उन्होंने इस बार निजी अच्छाई और संगठित धर्म के बीच बारीक रेखा खींच दी है। वह वामपंथी लीडर शंकर दयाल तिवारी की याद में आयोजित एक सालाना समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा-धर्म और नैतिकता पर काफी बड़ी बातें कीं।

    जावेद अख्तर बोले-धर्म नैतिक समाज पैदा नहीं करता

    जावेद अख्तर ने कहा-मैं धार्मिक लोगों की बहुत इज्जत करता हूं, जो आमतौर पर अच्छे इंसान भी होते हैं। हालांकि, धर्म अपने आप में जरूरी रूप से नैतिक समाज पैदा नहीं करता है। धर्म अच्छे और गलत काम की बात जरूर करता है, लेकिन वह लालच और डर दिखाता है। लालच और डर हमारी नैतिकता नहीं हो सकती है।

    तो मिडिल ईस्ट में होती और ज्यादा शांति

    जावेद अख्तर ने वैश्विक उदाहरण देते हुए बताया कि अगर सिर्फ धर्म ही नैतिक व्यक्ति बनाता तो मिडिल ईस्ट ज्यादा शांतिपूर्ण हो गया होता। इसके उलट, पश्चिमी यूरोप में जहां चर्च अक्सर खाली रहते हैं, वहां पर ज्यादा इंसाफ, आजादी और महिलाओं के लिए बेहतर सुरक्षा होती है।
    नवभारत टाइम्स पर छपी एक खबर के अनुसार, जावेद अख्तर ने कहा है कि धर्म में सिखाया जाता है कि अच्छे काम करोगे तो जन्नत और गलत काम करोगे तो दोजख मिलेगा। जो धार्मिक हैं और अच्छे काम करते हैं, उनकी मैं इज्जत करता हूं। धर्म में कोटा तय होता है। पांच बार नमाज पढ़ लो, कोटा पूरा। एक घंटे पूजा कर लो, कोटा पूरा। मैं क्या करूं? मुझे तो किसी की मदद करनी पड़ेगी। फिर भी कोटा कभी पूरा नहीं होगा।

    जावेद अख्तर ने बता दी अच्छाई की हद

    नैतिकता पर बात करते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि इंसानी भावनाओं और व्यवहार की प्राकृतिक सीमाएं होती हैं। एक इंसान एक हद तक ही दौड़ सकता है, एक हद तक ही देख सकता है, या एक हद तक ही दुख मना सकता है। उसके बाद, इंसान ठीक हो जाते हैं। यहां तक कि अच्छाई की भी अपनी सीमाएं होती हैं। उन्होंने कहा-नैतिकता को अनिश्चित काल तक बढ़ाया नहीं जा सकता या कृत्रिम रूप से थोपा नहीं जा सकता।

    नास्तिक कौन है, क्या है इसका मतलब

    बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं। इस्लाम के अनुसार, इस धारणा का कुरान में जिक्र कुछ ही बार मिलता है। वहीं, अरबी में नास्तिकता आम तौर पर इल्हाद के रूप में किया जाता है। हालांकि, इसका अर्थ विधर्म भी होता है। सृष्टिकर्ता के अस्तित्व को नकारने वाले व्यक्ति को दहरिया कहा जाता है।

    उर्दू या संस्कृत में कौन सबसे पुरानी पर दिया था जवाब

    इसी साल जनवरी में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ऑडियंस में से एक व्यक्ति ने जावेद अख्तर से पूछा था कि कौन सी भाषा पुरानी है-उर्दू या संस्कृत। जावेद अख्तर ने जवाब दिया-उर्दू संस्कृत की छोटी बहन है। संस्कृत दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा है। उर्दू तो हजार साल पुरानी भी नहीं है। जावेद अख्तर ने कहा कि तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा माना जाता है, जबकि संस्कृत दूसरी सबसे पुरानी भाषा है।

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