कोलंबिया के कंट्रोलर जनरल (वित्तीय नियंत्रण के लिए जिम्मेदार विभाग, राज्य ऑडिटर) ने सरकार को अपना फैसला सौंप दिया है। आधिकारिक घोषणा में बताया गया है कि ऑडिट के दौरान, कोलंबिया और स्वीडन के बीच किए गये समझौते से संबंधित सभी डॉक्यूमेंट्स की जांच की गई, जिसमें वित्तीय और गोपनीय तकनीकी डॉक्यूमेंट्स शामिल थे। इसमें ग्रिपेन और राफेल के बीच मूल्यांकन किया गया था और ग्रिपेन के ऑफर को सबसे बेहतरीन कहा गया है।
ग्रिपेन के मुकाबले रेस क्यों हार गया राफेल लड़ाकू विमान
रिपोर्ट के मुताबिक कोलंबिया ने स्वीडन के साथ 17 नये ग्रिपेन लड़ाकू विमानों के लिए सौदा किया है। इसके तहत 15 सिंगर सीट ग्रिपेन E और 2 ट्विन-सीट ग्रिपेन F खरीदे जाने हैं। इन विमानों की टेक्निकल-ऑपरेशनल ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और हथियारों की कीमत करीब 220 मिलियन डॉलर प्रति विमान होगी। दरअसल, कोलंबिया में इसी कीमत को लेकर बवाल भी हुआ था। इतनी ज्यादा कीमत का विमान होने की वजह से इस डील को जांच का सामना करना पड़ा।
इस डील के लिए पेमेंट की शर्तों के मुताबिक कॉन्ट्रैक्ट की कीमत का 40% छह अलग-अलग एडवांस पेमेंट में 2026 से 2031 के बीच देना होगा। बाकी 60% रकम फाइटर जेट की डिलीवरी के समय 2028 से 2032 के बीच देनी होगी। रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादा कीमत होने के बावजूद फ्रांस, कोलंबिया को राफेल के किसी भी कंपोनेंट का टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए तैयार नहीं था। लेकिन स्वीडन के साथ समझौता करने से कोलंबोयि का सेंसर, एवियोनिक्स, हथियार, कीमत, इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ कई अहम टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिल रहे थे।
अमेरिका से क्यों डर रहा कोलंबिया
इस आकलन में कोलंबिया के लिए राफेल से ज्यादा ग्रिपेन फाइटर जेट फायदेमेंद साबित हो रहा था। लेकिन कोलंबिया के लिए ये डील भी आसान नहीं होने वाला है। क्योंकि स्वीडिश हथियार कंपनी SAAB, जो ग्रिपेन लड़ाकू विमान बनाती है, वो इस विमान के लिए कई क्रिटिकल कंपोनेंट अमेरिका से मंगवाती है और चूंकी डोनाल्ड ट्रंप के कोलंबिया से संबंध खराब हो गये हैं, ऐसे में आशंका है कि अमेरिका, कोलंबिया को विमान बेचने पर वीटो भी लगा सकता है, जिससे इस विमान का सौदा नहीं हो पाएगा।














