IIT गुवाहाटी की एलुमनाई और सैमसंग की पूर्व डिजाइनर अंकिता खांटे लंदन में एक छोटे से सपर क्लब (जहां लोग साथ बैठकर खाना खाते हैं) को चलाती हैं। यह क्लब अजनबियों के बीच खाने के जरिए दोस्ती का पुल बनाता है। हाल ही में, उन्होंने वायरल बिरयानी से बात करते हुए अपनी कहानी बताई। वह गोलगप्पे यानी पानी पूरी बेचकर अच्छी कमाई कर रही हैं।
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कुछ खास करने का फैसला
नागपुर में पली-बढ़ीं अंकिता ने अपनी पढ़ाई VNIT नागपुर से आर्किटेक्चर में शुरू की, और फिर IIT गुवाहाटी से डिजाइन में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया। साल 2024 में शादी के बाद वह यूनाइटेड किंगडम चली गईं। उनके पति, जो यूपी के ओबरा के रहने वाले हैं, कंप्यूटर साइंस में पढ़े हैं और उन्होंने IIT धनबाद और IIIT हैदराबाद से पढ़ाई की है। हालांकि, उन दोनों को खाने या हॉस्पिटैलिटी का कोई खास अनुभव नहीं था, फिर भी उन्होंने भारतीय स्टाइल की मेहमान नवाजी के जरिए कुछ खास बनाने का फैसला किया।
कैसे शुरू हुआ सब कुछ?
लंदन आने के बाद अंकिता ने नए देश में ढलने और वहां के प्रोफेशनल माहौल को समझने के लिए कुछ समय काम से ब्रेक लिया। इससे पहले, वह करीब तीन साल बेंगलुरु में सैमसंग रिसर्च में प्रोडक्ट डिजाइनर के तौर पर काम कर चुकी थीं। दोस्तों को घर बुलाना और उन्हें खाना खिलाना उन्हें हमेशा से पसंद था। यह शौक धीरे-धीरे एक बड़े मकसद वाले प्लान में बदल गया।
6000 रुपये प्रति व्यक्ति
इसी प्लान से ‘The Bouzi Club’ का जन्म हुआ। यह एक मासिक, टिकट वाला सपर क्लब है जिसे यह कपल अपने घर पर ही होस्ट करता है। हर बार, वे करीब दस से बारह मेहमानों को बुलाते हैं। उन्हें सात कोर्स का एक खास मेन्यू परोसा जाता है, जिसमें भारतीय स्वाद को नए अंदाज में पेश किया जाता है। इस अनुभव की कीमत पचास पाउंड (करीब 6,000 रुपये) प्रति व्यक्ति है। यहां खाने के साथ-साथ बातचीत पर भी उतना ही जोर दिया जाता है। उनका असली मकसद उन लोगों के लिए एक कम्युनिटी बनाना था जो लंदन में बिना किसी सोशल सर्कल के रह रहे थे। उनका मानना था कि खाना लोगों को जोड़ने का सबसे आसान तरीका है।
ज्यादा पसंद की जाने वाली डिश
उनकी दो खास डिश बहुत पसंद की जाती हैं। इनमें ढोली कढ़ी और नागपुर-स्टाइल सांभर वड़ी शामिल हैं। ये ऐसी क्षेत्रीय डिशेज थीं जो रेस्टोरेंट के मेन्यू में शायद ही कभी मिलती थीं, और लंदन में तो बिल्कुल भी नहीं। मेहमानों को ऐसे स्वाद पसंद आए जो आरामदायक भी थे और नए भी, स्वादिष्ट भी और अपनी जड़ों से जुड़े भी।
गोलगप्पे ने दी रफ्तार
अंकिता बताती हैं कि शुरुआत में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला। लेकिन उन्होंने जैसे ही गोलगप्पे पेश किए गए, चीजें बिल्कुल बदल गईं। कहानियां सामने आने लगीं। हंसी-मजाक शुरू हो गया। हर मेहमान के पास किसी गली के नुक्कड़, स्कूल के दिनों, देर शाम की क्रेविंग या पारिवारिक आउटिंग की कोई न कोई याद थी। अंकिता कहती हैं कि गोलगप्पे को पूरे भारत में पसंद किया जाता है। हर किसी के पास गोलगप्पे की एक कहानी है। उन कहानियों को साझा करने से न सिर्फ बातचीत बढ़ी, बल्कि जुड़ाव भी बढ़ा।













