ज्योतिष शास्त्र का मूल उद्देश्य समय का बोध कराना है, किस समय कौन-सा कार्य करना उचित रहेगा और किस समय सावधान रहने की आवश्यकता है। जो व्यक्ति ग्रह-नक्षत्रों की गणना द्वारा समय की चाल को समझ लेता है, वह असफलता में भी सफलता प्राप्त करने की क्षमता रखता है।
महादशा, अंतर्दशा और गोचर जन्मकुण्डली में यह बताती हैं कि जीवन में कौन-सा समय संघर्ष का है और कौन-सा समय सृजन का है। यदि व्यक्ति विपरीत समय में सावधानी और धैयपूर्वक कार्य करें तो ज्योतिष शास्त्र का मार्गदर्शन और उपाय उसे मुसीबतों से बचा सकता है। जन्मकुण्डली बताती है कि किस क्षेत्र में सावधानी चाहिए और किस क्षेत्र में व्यक्ति को अपार सफलता की संभावनाएं है। जब व्यक्ति इन सम्भावनाओं पर जी-तोड़ कर मेहनत करता है तो भाग्य में लिखा पूर्ण फल व्यक्ति को प्राप्त होता है, परन्तु ज्योतिष शास्त्र द्वारा सम्भावनाओं को जानकर भी जो व्यक्ति कर्म नहीं करता है, वह उन सम्भावनाओं के लाभ से वंचित हो जाता है। इसलिए बड़े-बुजुर्गों के मुख से सुना कहा है कि-
‘सकल पदार्थ हैं जग माही, कर्महीन नर पावन नाहीं’
जो व्यक्ति समय, ग्रह और कर्म के समन्वय को समझ लेता है, वही हर कठिन परिस्थिति को अवसर में बदल देता है। यही ज्योतिष की वास्तविक सार्थकता और जीवनोपयोगी शक्ति है।
व्यक्ति के जीवन में समय-समय पर किसी ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा इत्यादि देखने को मिलती है। हर दशा में एक विशेष प्रकार का कर्म फलदायी होता है। जो व्यक्ति जन्मकुण्डली में ग्रहों की दशा समझ लेता है और समय के अनुसार उस पर कार्य करता है, वह सचमुच अपने जीवन की दिशा बदल लेता है, ऐसा व्यक्ति निरन्तर नुकसान से बचकर लाभ की ओर बढ़ता रहता है। जन्मकुंडली व्यक्ति की शक्ति और कमजोरी दोनों को दर्शाती है। जो अपनी सीमाओं को जानता है, वह अनावश्यक जोखिम नहीं लेता और सही अवसर पर सही निर्णय करता है।














