दिल्ली में वक्त के साथ सड़क पर बढ़ते ट्रैफिक ने हर किसी का हाल बेहाल कर रखा है। सुशांत जिस दिन दिल्ली पहुंचे, उसी दिन उन्हें यहां ट्रैफिक का सामना करना पड़ा। दिल्ली के ट्रैफिक पर बात करते हुए वह कहते हैं, ‘जिस तरह पूरे देश में विकास हुआ है, उसी तरह दिल्ली के ट्रैफिक में भी विकास हुआ है। हालांकि मुंबई में भी ट्रैफिक कम नहीं है, तो हम यहां भी उतना परेशान नहीं हुए। मगर ट्रैफिक एक ऐसी चीज है कि आप उसका कुछ नहीं कर सकते। लेकिन हां, कुछ पुराने दिन जरूर याद आ जाते हैं, जब कॉलेज के दिनों में आधी रात को हम आईटीओ पर पराठे खाने आते थे।’
‘बिंदिया के बाहुबली’ की एक ही कहानी के दो सीजन बने हैं
सुशांत इन दिनों वेब सीरीज ‘बिंदिया के बाहुबली सीजन 2‘ को लेकर भी चर्चा में हैं। इसमें वह पुलिस ऑफिसर का रोल अदा कर रहे हैं। सुशांत कहते हैं, ‘हमने इसे एक कहानी में पिरोया था, लेकिन यह इतनी लंबी हो गई तो मेकर्स ने इसे दो सीजन में रिलीज करने का फैसला किया।’ क्या इससे दर्शकों का कनेक्शन बीच में नहीं टूटता? इसके जवाब में वह कहते हैं, ‘हां, यह सच है। अगर मुझे कोई सीरीज पसंद आती है तो मैं भी सोचता हूं कि उसे एक ही बार में पूरा देख लूं। मगर जब ब्रेक आ जाता है, तो कई दर्शक पुरानी कहानी के कुछ पहलू भूल जाते हैं, कुछ को वापस आकर देखना होता है, तो कुछ छोड़ देते हैं। तो यह एक तरह की अच्छाई भी है कि पुराने सीजन के कुछ व्यूज बढ़ जाते हैं, जबकि बुराई भी है कि नए सीजन के कुछ दर्शक घट जाते हैं।’
‘टीवी पर रेगुलेशन था, OTT पर गालियां हैं, लोग ऊब चुके हैं’
OTT पर वेब सीरीज में इन दिनों खूब गालियां दी जाती हैं। ऐसे में शो में गालियों के सवाल पर सुशांत कहते हैं, ‘हमारे देश में कभी इतना ओपन कल्चर तो रहा नहीं। टीवी पर भी कई रेगुलेशन थे कि खून सीमित दायरे में दिखा सकते हैं, अडल्ट कंटेंट रात को 10 से पहले नहीं दिखा सकते, वगैरह। ऐसे में जब ओटीटी आया, जिस पर कोई रेगुलेशन नहीं था, तो लोगों को लगा कि बस यही सब दिखाकर हिट हो जाओ। लोगों को भी शुरू में यह सब पसंद भी आया। पर्दे पर गालियां सुनकर लोगों को ऐसा भी लगता है कि यह उनकी आम भाषा में बात हो रही है। लेकिन फिर एक सिचुएशन यह भी आई कि लोग इसे देखकर ऊब चुके हैं और अब वह समझ जाते हैं कि गालियां कहानी की जरूरत है या बस लोगों को आकर्षित करने के लिए दी गई हैं।’
‘पूरी दुनिया राइट विंग और नॉन राइट विंग में बंटी हुई है’
कुछ दिनों पहले एआर रहमान ने फिल्म इंडस्ट्री में सांप्रदायिकता के हावी होने की बात कही थी। क्या यह सच है? इस सवाल के जवाब में सुशांत कहते हैं, ‘मैंने उनका बयान सुना नहीं है। उन्होंने अपने अनुभव पर यह कहा होगा। लेकिन अगर आप नोटिस करें तो पिछले कुछ समय से पूरी दुनिया ही दो खेमों में बंटी हुई है। एक है राइट विंग और एक है नॉन राइट विंग। इन राइट विंग से उन धनी लोगों को खूब फायदा हो रहा है, जो दुनिया चलाते हैं। इतिहास देखिए तो यही दिखेगा कि राइट विंग अपने संसाधन कॉरपोरेट्स के हाथों में दे देता है। तो इसका कुछ असर तो हमारी इंडस्ट्री पर भी पड़ा होगा।’
‘हम बहुत जल्दी आहत हो जाते हैं, इससे कहानी कहने के मौके कम हो जाते हैं’
फिल्म इंडस्ट्री में आए बदलावों पर वह कहते हैं, ‘तकनीकी स्तर पर तो बहुत बदलाव आए हैं। लेकिन मेकर्स की सोच में कोई बदलाव नहीं दिखता। कमर्शियल सिनेमा तब भी सिर्फ सुपरहिट फिल्म बनाना चाहता था। कहानी कहने की सोच तो कमर्शियल सिनेमा में है ही नहीं। वहां सुपरस्टार की इमेज काम करती है, जैसे कि ये एक्शन स्टार है, ये रोमांस का स्टार है। ओटीटी का स्पेस खुला तब हमने राइटिंग को सीरियसली लिया। तब हमने पहली बार सुना कि राइटिंग लैब्स होते हैं, जहां आप आइडिया लेकर आते हैं। लेकिन फिर जैसी हमारी सोसायटी है, हम बहुत जल्दी आहत हो जाते हैं। किसी भी चीज से हमारी भावनाएं आहत होनी शुरू हो गईं। अब अगर हम उनका ध्यान ना रखें तो कलाकारों के ऊपर केस हो जाते हैं। तो इससे कहानी कहने के मौके और कम हो जाते हैं। इसलिए फिर कहानियां भी रिपीट होती हैं।’














