जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) और फिल्म निर्माता नीरज पांडे को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने फिल्म निर्माता से कहा कि आप ऐसे शीर्षक का उपयोग कर समाज के किसी वर्ग को क्यों बदनाम करना चाहते हैं? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी जगह है, लेकिन इससे किसी को बदनाम करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता। यह नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है।’
कोर्ट ने कहा- शपथ पत्र में फिल्म का बदला हुआ ‘टाइटल’ भी प्रस्तुत करें
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा, ‘जब तक आप हमें बदला हुआ शीर्षक नहीं बताते, हम फिल्म रिलीज की अनुमति नहीं देंगे। हमें लगा था कि फिल्म निर्माता, पत्रकार आदि जिम्मेदार लोग होते हैं।’ अदालत ने नीरज पांडे को शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया कि यह फिल्म किसी भी समाज के वर्ग को बदनाम नहीं करती। साथ ही इस शपथ पत्र में फिल्म का बदला हुआ ‘टाइटल’ भी प्रस्तुत करने को कहा है।
अदालत ने कहा- 19 को अगली सुनवाई, तब तक हल्ला-गुल्ला नहीं
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, ‘हमें नया नाम दें और एफिडेविट फाइल करें। बोलने की आजादी एक चीज है। लेकिन इससे किसी को बदनाम करने का लाइसेंस नहीं मिलता।’ इस पर प्रोड्यूसर के ओर से पेश वकील ने कहा, ‘हमने नाम वापस ले लिया है।’ दोनों जजों की बेंच ने आखिरी में कहा, ‘यह सब एफिडेविट में लिखिए। मामला आगे की सुनवाई के लिए 19 फरवरी 2026 को पोस्ट किया गया। तब तक इस मामले पर कोई ‘हल्ला गुल्ला’ मत करो। राई का पहाड़ मत बनाओ।’
वकील ने कहा- अभी नया शीर्षक तय नहीं किया
गुरुवार को सुनवाई के दौरान फिल्म निर्माता की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि अभी नया शीर्षक तय नहीं किया गया है, लेकिन अदालत को आश्वस्त किया कि ऐसा शीर्षक चुना जाएगा, जिससे कोई विवाद न हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा, ‘आप यह कहें कि आप यह शीर्षक नहीं रखेंगे। हम अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन उस पर कुछ वाजिब प्रतिबंध भी हैं। हम इसमें ‘बंधुता’ (fraternity) के पहलू को शामिल करना चाहते हैं। यह संविधान के मूल सिद्धांतों में से एक है। समाज में पहले से दरारें हैं, ऐसे में इस तरह का विभाजन क्यों? किसी को बदनाम क्यों करें? जागरूक होना एक बात है, लेकिन जनता को बदनाम कर अशांति पैदा करना दूसरी बात है। आप अशांति बढ़ा रहे हैं।’
अतुल मिश्रा ने फिल्म के खिलाफ दी है जनहित याचिका
सुप्रीम कोर्ट मामले में अतुल मिश्रा द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रहा था, जो भारत ब्राह्मण समाज के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं। उन्होंने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। याचिका में कहा गया है कि फिल्म का शीर्षक और कहानी पहली नजर में आपत्तिजनक और अपमानजनक है, जो ब्राह्मण समुदाय को बदनाम तरीके से प्रस्तुत करती है। इसमें ‘पंडत’ जैसे जाति और धर्म से जुड़े शब्द को ‘घूसखोर’ (रिश्वतखोर) जैसे नैतिक भ्रष्टाचार दर्शाने वाले शब्द के साथ जोड़ने पर आपत्ति जताई गई है।
‘घूसखोर पंडत’ पर याचिका में लगाए हैं ये आरोप
फिल्म के खिलाफ दर्ज याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह फिल्म जाति और धर्म आधारित रूढ़ियों को बढ़ावा देती है और सार्वजनिक व्यवस्था, सांप्रदायिक सद्भाव तथा संवैधानिक मूल्यों के लिए खतरा है। ‘घूसखोर पंडत’ का निर्माण नीरज पांडे ने किया है। इसकी हाल ही में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में नेटफ्लिक्स द्वारा घोषणा की गई थी। फिल्म में मनोज बाजपेयी के साथ नुसरत भरूचा, साकिब सलीम, अक्षय ओबेरॉय और दिव्या दत्ता भी हैं।
नेटफ्लिक्स ने हाई कोर्ट ने कहा था- नाम बदला जाएगा
इससे पहले, मंगलवार को नेटफ्लिक्स इंडिया ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया था कि फिल्म का नाम बदला जाएगा। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया था कि निर्माता ने उठी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए फिल्म का शीर्षक ‘घूसखोर पंडत’ से बदलकर ऐसा वैकल्पिक शीर्षक रखने का सचेत निर्णय लिया है, जो फिल्म की कहानी और उद्देश्य को अधिक सटीक रूप से दर्शाए।














