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  • माथे पर बिंदी और ‘ना दे दिल परदेशी नू’ पर गजब नाची, विंटर ओलंपिक में रशियन स्केटर का वीडियो दिल थामकर देखें

    नई दिल्ली: विंटर ओलंपिक्स 2026 में भारतीय एथलीटों की अनुपस्थिति के बावजूद, फिगर स्केटिंग के रिंग में एक भारतीय जुड़ाव ने दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जॉर्जिया का प्रतिनिधित्व कर रही रूसी मूल की स्केटर अनास्तासिया गुबानोवा ने हिंदू सांस्कृतिक थीम और भारतीय संगीत पर अपनी शानदार प्रस्तुति देकर करोड़ों भारतीयों का दिल


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    By Azad Hind Desk फरवरी 12, 2026
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    नई दिल्ली: विंटर ओलंपिक्स 2026 में भारतीय एथलीटों की अनुपस्थिति के बावजूद, फिगर स्केटिंग के रिंग में एक भारतीय जुड़ाव ने दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जॉर्जिया का प्रतिनिधित्व कर रही रूसी मूल की स्केटर अनास्तासिया गुबानोवा ने हिंदू सांस्कृतिक थीम और भारतीय संगीत पर अपनी शानदार प्रस्तुति देकर करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया है। भारत के लोगों इस पर काफी गर्व महसूस हो रहा है।

    मैदान में भारत नहीं, पर गूंजा भारतीय संगीत

    इटली में आयोजित हो रहे इन खेलों में भारत ने फिगर स्केटिंग अनुशासन में कोई प्रतियोगी नहीं उतारा था। लेकिन जब अनास्तासिया गुबानोवा बर्फ पर उतरीं, तो माहौल पूरी तरह बदल गया। उन्होंने अपनी रूटीन के लिए भारतीय वाद्ययंत्रों और हिंदू संस्कृति से प्रेरित संगीत को चुना। उनकी इस कलात्मक प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और यह पल सोशल मीडिया पर सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक बन गया। उन्होंने माथे पर बिंदी लगा रखी थी। जो काफी सुंदर लग रही थी। उन्होंने ना दे दिल परदेशी नू गाने पर परफॉर्म किया।

    सांस्कृतिक सीमाओं से परे कला का प्रदर्शन

    विशेषज्ञों का मानना है कि अनास्तासिया की यह पसंद न केवल भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि खेल कैसे सीमाओं को तोड़कर देशों को जोड़ सकते हैं। भले ही वह आधिकारिक तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही थीं, लेकिन उनके प्रदर्शन ने उस वैश्विक मंच पर भारतीय विरासत की मौजूदगी दर्ज करा दी, जहां भारत शारीरिक रूप से अनुपस्थित था।

    सॉफ्ट पावर और बुनियादी ढांचे पर छिड़ी बहस

    इंटरनेट पर इस प्रदर्शन ने दो तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है, पहला, सांस्कृतिक प्रभाव। भारतीय संगीत और विरासत की वैश्विक पहुंच को एक बार फिर सराहा गया और दूसरा खेल ढांचा, इस पल ने भारत में शीतकालीन खेलों के बुनियादी ढांचे और एथलीटों की कमी पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। फैंस का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हमारी संस्कृति को बढ़ावा दे सकते हैं, तो भारत को खुद इस खेल में अपने टैलेंट को आगे बढ़ाने पर निवेश करना चाहिए। अनास्तासिया की यह परफॉरमेंस एक रिमाइंडर है कि संस्कृति अपनी जगह खुद बना लेती है, चाहे स्कोरबोर्ड पर देश का नाम हो या न हो।

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