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  • Shiv Puran Shiv Manas Puja Vidhi : शिव मानस पूजा, जब पूजा के लिए कोई साधन न हो तो ऐसे करें महाशिवरात्रि की सरल मंत्र पूजा

    महाशिवरात्रि के व्रत और पूजा का शिव पुराण में खास महत्व बताया गया है। इस दिन विधिपूर्वक शिवजी की आराधना करने से भक्तों पर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है। साथ ही, मनोकामनाएं भी पूर्ण हो सकती हैं। लेकिन अगर ऐसी स्थिति बन जाए की महाशिवरात्रि पर आपके पास पूजा का कोई साधन न हो


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    By Azad Hind Desk फरवरी 15, 2026
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    महाशिवरात्रि के व्रत और पूजा का शिव पुराण में खास महत्व बताया गया है। इस दिन विधिपूर्वक शिवजी की आराधना करने से भक्तों पर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है। साथ ही, मनोकामनाएं भी पूर्ण हो सकती हैं। लेकिन अगर ऐसी स्थिति बन जाए की महाशिवरात्रि पर आपके पास पूजा का कोई साधन न हो या किसी यात्रा में हों तो इसके लिए भी शिव पुराण में एक विशेष विधि बताई गई है। मान्यता है की महाशिवरात्रि के दिन मानसिक तौर पर सरल पूजा मंत्र का जाप करने से पूर्ण फल की प्राप्ति हो सकती है। आइए शिव पुराण से जानें शिव मानस पूजा …

    शिव पुराण में बताई गई शिव मानस पूजा विधि के द्वारा मानसिक पूजा की जाती है। इसमें भगवान शिव का स्मरण करते हुए मन ही मन में उन्हें जल, धूप, दीप, पुष्प, भोग आदि अर्पित किया जाता है। श्रद्धाभाव से इस मंत्र का उच्चारण करने से अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति हो सकती है।

    शिव मानस पूजा ( Shiv Manas Puja )
    रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं, नानारत्नविभूषितं मृगमदा-मोदाङ्कितं चन्दनम्। जातीचम्पकविल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा, दीपं देव, दयानिधे, पशुपते, हृत्कल्पितं गृह्यताम्। सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं, भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्। शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं, ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु। छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं, वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा। साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया। संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो। आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं, पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रासमाधिस्थितिः । सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो, यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्। करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा, श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम्। विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व, जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो।

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