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  • नरेंद्र मोदी का बधाई संदेश और तारिक रहमान का न्योता, पटरी पर आएंगे भारत-बांग्लादेश के रिश्ते?

    ढाका: बांग्लादेश के चुनाव में बीएनपी की जीत के बाद ढाका-दिल्ली के रिश्तों में जमी बर्फ कुछ हद तक पिघलती दिखी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीएनपी चीफ तारिक रहमान को बधाई दी और भारत के समर्थन का वादा किया। तारिक रहमान और उनकी पार्टी की ओर से इस संदेश का गर्मजोशी के साथ जवाब


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    By Azad Hind Desk फरवरी 15, 2026
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    ढाका: बांग्लादेश के चुनाव में बीएनपी की जीत के बाद ढाका-दिल्ली के रिश्तों में जमी बर्फ कुछ हद तक पिघलती दिखी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीएनपी चीफ तारिक रहमान को बधाई दी और भारत के समर्थन का वादा किया। तारिक रहमान और उनकी पार्टी की ओर से इस संदेश का गर्मजोशी के साथ जवाब दिया गया। ढाका से नरेंद्र मोदी को शपथ ग्रहण का न्योता भी भेजा गया है। यह इसलिए खास है क्योंकि जुलाई 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश और भारत के बीच एक अविश्वास देखा गया है।

    बीबीसी की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली के लिए बीएनपी सरकार से जुड़ना का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि कैसे कट्टरपंथ पर अपनी रेड लाइन को सुरक्षित रखते हुए चीजों को फिर से शुरू किया जाए। एनालिस्ट का कहना है कि रिश्ते में रीसेट मुमकिन है लेकिन इसके लिए कंट्रोल और आपसी तालमेल की जरूरत होगी।

    बीएनपी भारत के लिए नई नहीं

    SOAS यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर अविनाश पालीवाल कहते हैं, ‘जमात के मुकाबले बीएनपी पॉलिटिकल रूप से अनुभवी और नरमपंथी पार्टी है। ऐसे में भारत के लिए वह सुरक्षित दांव है। यह सवाल बना हुआ है कि रहमान कैसा शासन चलाएंगे और भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर उनका रुख क्या रहेगा।’

    दिल्ली के लिए BNP कोई अनजान पार्टी नहीं है। तारिक रहमान की मां खालिदा जfया के नेतृत्व में पार्टी 2001 में ढाका में इस्लामी जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी की सरकार रही है। उस दौरान भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते ठंडे रहे थे। BNP का झुकाव तब वॉशिंगटन, बीजिंग और इस्लामाबाद के साथ रिश्ते में ज्यादा रहा था।

    समय के साथ बदले हैं रिश्ते

    दिल्ली के इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस की स्मृति पटनायक ने बीबीसी से कहा, ‘हमें बांग्लादेश के पाकिस्तान के साथ रिश्ते पर चिंका की जरूरत नहीं हैं। एक संप्रभु देश होने के नाते उसे इसका हक है। अजीब बात यह थी कि हसीना के समय में पाकिस्तान से बातचीत रुक गई और झुकाव दिल्ली की तरफ हो गया। अब इसके दूसरी तरफ झूलने का खतरा है।’

    पटनायक कहती हैं, ‘बीएनपी को यह मानना होगा कि हसीना के भारत से ढाका वापस आने की उम्मीद कम है। ढाका में विपक्षी पार्टियां सरकार पर जरूर यह दबाव बनाएगी कि वह भारत पर हसीना की वापसी के लिए दबाव डाले। ऐसे में तारिक रहमान के लिए भी इस स्थिति को संभालना आसान नहीं होने जा रहा है।

    आर्थिक और सैन्य सहयोग

    भारत और बांग्लादेश सालाना मिलिट्री एक्सरसाइज करते हैं, कोऑर्डिनेटेड नेवल पेट्रोलिंग करते हैं, सालाना डिफेंस डायलॉग करते हैं और डिफेंस खरीद के लिए 500 मिलियन डॉलर का इंडियन लाइन ऑफ क्रेडिट चलाते हैं। पटनायक कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि BNP उस सहयोग को वापस लेगी।

    दोनों देशों को भूगोल और इकोनॉमिक्स जोड़ते हैं। बांग्लादेश साउथ एशिया में भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, और भारत एशिया में बांग्लादेश का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट बन गया है। दोनों देशों का लंबा साझा बॉर्डर और साझा संस्कृति भी रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने में काफी मददगार हो सकती है।

    संबंध सुधार की पहल कौन करेगा

    पालीवाल कहते हैं, ‘बीएनपी के साथ भारत के रिश्ते में अविश्वास की झलक मिलती है। हालांकि आज के जियोपॉलिटिकल हालात को देखते हुए रहमान ने पॉलिटिकल समझदारी दिखाई है और दिल्ली भी प्रैक्टिकल बातचीत के लिए तैयार है, ये अच्छे संकेत हैं। सवाल यह है कि पहले कौन आगे बढ़ेगा।

    दत्ता कहते हैं, ‘बड़े पड़ोसी के तौर पर भारत को पहल करनी चाहिए। भारत को आउटरीच करना चाहिए। बांग्लादेश में चुनाव के बाद दिल्ली बातचीत करे और देखे कि कैसे चीजों को पटरी पर लाया जा सकता है। उम्मीद कर सकते हैं कि BNP ने भी अतीत से सबक सीखा होगा और वह आगे बढ़ेगी।

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