पाकिस्तान की UNSC में चाल
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि असीम इफ्तिखार अहमद ने बैठक में कहा, अगर प्राकृतिक संसाधनों को कंट्रोल करने वाली संधि को एकतरफा तरीके से रद्द किया जा सता है, तो कहीं भी कोई भी समझौता सुरक्षित नहीं है। यह पाकिस्तान की सोच समझकर दिया गया बयान था। हाल ही में यूरोपीय यूनियन और अमेरिका के साथ भारत के ट्रेड एंगेंजमेंट के बाद पाकिस्तान को दुनिया का मूड समझ में आ गया है। यही वजह है कि वह पानी के बंटवारे के मुद्दे को ऐसे पेश कर रहा है, जो डिप्लोमैटिक दबाव को मौका देता है।
पाकिस्तान चाहता है कि दोनों देशों के बीच जल समझौते में वह अंतरराष्ट्रीय पक्ष को शामिल करे। हालांकि, भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को साफ न कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में उत्तम कुमार सिन्हा ने लिखा , कि पाकिस्तान जिस सिंधु जल समझौते को अंतरराष्ट्रीय व्ववस्था के लिए टेस्ट केस बता रही है,उसे पूरी तरह से द्विपक्षीय फ्रेमवर्क के तौर पर सोचा गया था। इसे बनाने वाले जानते थे कि जब नदी के पानी का प्रबंधन अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में गया तो सहयोग खत्म हो जाएगा।
पाकिस्तान का साथ देने वालों से सवाल
उन्होंने लिखा कि भारत ने सीमा पार आतंकवाद, मिलिट्री उकसावे और जहरीली बयानबाजी के बावजूद संधि को बनाए रखा है। अभी इसे खत्म नहीं किया गया है, बल्कि रोका गया है। दुनिया से पूछा जाना चाहिए कि एकतरफा उम्मीद कब तक बनी रह सकती है। खास तौर पर जब दूसरा पक्ष सहयोग का इरादा नहीं रखता है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वादे और जिम्मेदार की बात करता है, लेकिन असल में यह समझौते की भावना से बहुत पहले ही पीछे गट गया था।
भारत को बने रहना होगा मजबूत
ऐसे में भारत का फैसला संधि को रोकने के तौर पर नहीं, बल्कि संधि के असली बैलेंस को वापस पाने की कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए। सबसे खास बात यह है कि भारत इस समझौते से पीछे नहीं हटा है, बल्कि इसने हॉइड्रोलॉजिकल डेटा शेयर करने और मध्यस्थता प्रक्रिया में हिस्सा लेने जैसे रूटीन ऑपरेशन को सस्पेंड करके रोक दिया है। पाकिस्तान खुला झूठ बोल रहा है और एक असहमति को वैश्विक व्यवस्था के लिए खतरे के तौर पर दिखा रहा है। भारत को जोर देकर बताना चाहिए कि विवाद समझौते के होने या न होने के बारे में नहीं है, बल्कि इस बारे में है कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है।














