जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि पीड़ित को दिया जाने वाला मुआवजा सजा के बराबर या उसके विकल्प के रूप में नहीं माना जा सकता है। सजा दंडात्मक होती है और इसका उद्देश्य अपराधियों को यह सामाजिक संदेश देना है कि समाज के नैतिक मानदंडों का उल्लंघन करने पर गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, जिन्हें केवल पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।
पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हत्या के प्रयास के मामले में तीन साल की जेल की सजा को दो महीने की सजा में बदल दिया गया था, क्योंकि दोषी ठहराए गए दोनों व्यक्तियों ने पीड़ित को 50-50 हजार रुपये देने पर सहमति जताई थी। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आपराधिक कानून के सिद्धांत को पूरी तरह नजरअंदाज किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सजा न तो बहुत कठोर हो और न ही इतनी हल्की हो कि उसका डर ही कम हो जाए। सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं है; बल्कि समाज को जो नुकसान हुआ है उसको सही करना और व्यवस्था को सही रास्ते पर लाना है।













