नई नहीं है दबाव की नीति
जानकारों का मानना है कि भले ही ट्रंप अपने फैसलों को लेकर बेहद मुखर रहे हैं. लेकिन बीते दशक में दूसरी वैश्विक शक्तियों के सामने अमेरिका की इमेज बतौर एक सुपरपावर थोड़ी फीकी हुई है, जिसे दुरुस्त करने की कोशिश पूर्व के अमेरिकी प्रशासन ने भी की थी। बाइडेन प्रशासन ने चीन की सेमीकंडक्टर तक पहुंच को सीमित करने के लिए व्यापार प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया था. लेकिन ट्रंप ने इसे अपनी विदेश नीति और डिप्लोमेसी में टैरिफ का खुलेआम कह कर इस्तेमाल किया। टैरिफ कूटनीति की जगह ले ली। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अमेरिका के साझेदारों को थोड़ी राहत मिली है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय हालातों में बहुत ज्यादा फर्क देखने को नहीं मिलेगा।
नीति में बदलाव की गुंजाइश नहीं
अंतर्राष्ट्रीय मामलों की जानकार इंद्राणी बागची कहती है कि ट्रंप इसे स्टेट पॉलिसी की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं और ऐसा लगता नही कि वो इसमें बदलाव करेंगे। अगर वो इसकी वैधता ठहराने के लिए इमरजेंसी प्रावधान का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो और भी कानून हैं, जिनके तहत वो टैरिफ लागू कर सकते हैं, फिलहाल 15 फीसदी ड्यूटी लगाने के लिए ट्रंप ने सेक्शन 122 का इस्तेमाल किया है लेकिन अपनी टैरिफ नीतियों के लिए वो सेक्शन 232, सेक्शन 301 का भी सहारा ले सकते है। यानी दूसरे कानून है जिनके तहत टैरिफ नीति जारी रह सकती है। अभी मौजूदा वक्त में वो केवल इमरजेंसी प्रावधान का इस्तेमाल नहीं कर सकते। ट्रप पहले से ही कहते रहे हैं। कि उनकी टैरिफ नीतियां अमेरिका के खिलाफ अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिसेस को खत्म करने के लिए लाई गई है। ऐसे में उसमें फिलहाल कोई परिवर्तन आता नही दिख रहा है।
दूसरे देशों के पास सिर्फ बातचीत का रास्ता
जानकारों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय ग्लोबल ऑर्डर और ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को ध्यान में रखते हुए दूसरे देशों के पास अमेरिका से बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है। देशों के लिए टैरिफ युद्ध से निपटना एक चुनौती रही है, जिसकी प्रतिक्रिया सभी ने अपने अपने हिसाब से ही दी है।
अपने हितों को ध्यान में रखकर बना रहे नीति
जानकार कहते हैं कि अमेरिका में इस घटनाक्रम के बाद भी दुनिया के देशों की विदेश नीति में कोई खास बदलाव नहीं आएगा। अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंध हो या फिर जियो पॉलिटिकल मुद्दों पर रुख, कोई भी देश अपने हितों को ध्यान में रखकर ही विदेश नीति को आकार देगा।













