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  • Israel knesset: इजरायल की नेसेट क्या बला है, जिसमें पीएम मोदी को बुलाने पर छिड़ा संग्राम, तिरंगे की रोशनी से सजा

    नई दिल्ली/तेल अवीव: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को यानी आज से इजरायल के दो दिवसीय दौरे (25-26 फरवरी) पर हैं। वह इजरायल की संसद ‘नेसेट (Knesset)’ को संबोधित करने वाले हैं। ऐसा करने वाले वो भारत के पहले प्रधानमंत्री होंगे। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में नेसेट को संबोधित किया था। नेसेट


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    By Azad Hind Desk फरवरी 25, 2026
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    नई दिल्ली/तेल अवीव: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को यानी आज से इजरायल के दो दिवसीय दौरे (25-26 फरवरी) पर हैं। वह इजरायल की संसद ‘नेसेट (Knesset)’ को संबोधित करने वाले हैं। ऐसा करने वाले वो भारत के पहले प्रधानमंत्री होंगे। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में नेसेट को संबोधित किया था। नेसेट के सदस्यों के पास अमोघ शक्ति होती है। इस बीच, नेसेट को भारतीय तिरंगे के रंग में सजा दिया गया है। वहीं, पीएम मोदी ने भी नेसेट में संबोधन को लेकर उत्सुकता जताई है।
    यह दौरा तब हो रहा है, जब अमेरिका-ईरान में तनाव चरम पर है। ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें पीएम मोदी के इस दौरे पर हैं। जानते हैं वेडनेसडे बिग टिकट में नेसेट की पूरी कहानी जानने की कोशिश करते हैं और यह भी समझते हैं कि यह भारत से कितना अलग है?

    नेसेट को लेकर इतनी चर्चा क्यों, मोदी

    भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में आयोजित बैठक में नेतन्याहू की ओर से सुप्रीम कोर्ट के प्रेसीडेंट यित्जाक अमित को न्योता नहीं देने पर नेसेट में तीखी बहस छिड़ गई थी।
    अब इस ऐतिहासिक आयोजन के बहिष्कार का साया मंडरा रहा है। विपक्षी दलों ने सत्र और मोदी के भाषण का बहिष्कार करने की धमकी दी है, जिससे भारतीय दूतावास में अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
    नेसेट को संबोधित करना एक दुर्लभ सम्मान है जो दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच राजनीतिक सौहार्द को दर्शाता है। इस बीच नेसेट पर भारतीय तिरंगा लहरा दिया गया है। खुद इजरायली संसद के स्पीकर आमिर ओहाना ने सोशल मीडिया एक्स पर नेसेट की तस्वीर पोस्ट कर खुशी जताई है।

    क्या है नेसेट, कहां से आया यह नाम

    नेसेट इजरायली संसद का एक नाम है, जिसका मतलब है सभा या जुटान। नेसेट यूनिकैमरल लेजिस्लेचर है। नेसेट का नाम प्राचीन HaGdola से आया है, जो हिब्रू भाषा में है। इसका मतलब यहूदी परंपराओं में ग्रेट असेंबली है। यह 120 विद्वानों, चिंतकों और भविष्यवक्ताओं की सभा मानी जाती है। पीएम मोदी ने भी नेसेट के स्पीकर का जवाब देते हुए कहा-इस भाव से सम्मानित महसूस कर रहा हूं। आज संसद को संबोधित करने के लिए उत्सुक हूं।

    अब यूनिकैमरल क्या बला है

    विकीपीडिया के अनुसार, यूनिकैमरल का लैटिन में मतलब है एक सदनीयवाद या ण्क कक्ष। यह ऐसी विधायिका है जिसमें एक सदन या सभा होती है जो एक साथ कानून बनाती और मतदान करती है।
    एक सदनीयवाद तेजी से आम प्रकार की विधायिका बन गई है, जो सभी राष्ट्रीय विधायिकाओं का लगभग 60% हिस्सा बनाती है। और उप-राष्ट्रीय विधायिकाओं का इससे भी बड़ा हिस्सा बनाती है। वहीं, भारत में दो सदनीय संसद है, जिसमें उच्च सदन यानी राज्यसभा है, जबकि निचला सदन लोकसभा है।

    क्या करती है नेसेट

    • नेसेट यानी इजरायली संसद हर तरह के कानून को पारित करती है। यह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को चुनती है। यह कैबिनेट चुनती है और सरकार के कामकाज पर नजर रखती है। यह स्टेट कंप्ट्रोलर को भी चुनती है।
    • इसके उलट भारत में प्रधानमंत्री जनता के बीच से चुनकर आता है, जो सबसे बड़ी पार्टी के बहुमत का मुखिया होता है। राष्ट्रपति को भी संसद के दोनों सदनों के चुने हुए प्रतिनिधि ही चुनते हैं, जो परोक्ष चुनाव होता है।

    नेसेट कितनी ताकतवर है

    • नेसेट के सदस्यों को इम्युनिटी पॉवर होता है। उन्हें कोई छू भी नहीं सकता है। यह राष्ट्रपति और कंप्ट्रोलर को भी हटा सकती है। नो कॉन्फिडेंस वोट कराकर सरकार को बर्खास्त भी कर सकती है।
    • साथ ही खुद को भंगकर नए चुनाव कराने के लिए कह सकती है। जब तक चुनाव नहीं हो जाते, नेसेट अपनी अथॉरिटी कायम रखती है।

    कहां बैठती है नेसेट

    नेसेट गिवत राम में बनी एक बिल्डिंग में बैठती है। यह किरयात हमेमशाला स्थल पर बनी है। यह यरुशलम के पड़ोस में है। यह शहर भूमध्य सागर और मृत सागर के बीच जोडियन माउंटेन में बना है।

    पहली नेसेट कब बैठी थी

    पहली नेसेट 14 फरवरी, 1948 को तब बैठी थी, जब 20 जनवरी को चुनाव खत्म हुए थे। इसने प्रोविजिनल स्टेट काउंसिल की जगह ली थी। यह इजरायल की 14 मई 1948 को आजाद होने के बाद से इजरायल की आधिकारिक विधायिका थी।

    पश्चिम एशियाई भू-राजनीति के लिए अहम संकेत

    • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक 2017 की यात्रा के बाद इजरायल की यह दूसरी यात्रा है। यह उनके तीसरे कार्यकाल के दौरान पहली यात्रा है।
    • 25 से 26 फरवरी तक होने वाली यह यात्रा पश्चिम एशियाई भू-राजनीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हो रही है और रक्षा, प्रौद्योगिकी, नवाचार और व्यापार के क्षेत्र में भारत-इजरायल संबंधों को मजबूत करने के प्रयासों का संकेत देती है।

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