लट्ठमार होली की शुरुआत कैसे हुई
लट्ठमार होली बरसाने में खेली जाती है जहां राधा रानी का जन्म हुआ था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लट्ठमार होली के दिन भगवान श्री कृष्ण अपने ग्वालों के साथ गोकुल से बरसाना आते थे और यहां आकर राधा रानी और उनकी सखियों पर छुपकर रंग डाला करते थे। भगवान कृष्ण और उनके सभी सखा मिलकर राधा रानी और उनकी सखियों को बहुत तंग किया करते थे। इस पर राधा रानी और उनकी सखियां नाराज हो गई। मना करने के बाद भी जब भगवान कृष्ण और उनके सखा नहीं माने तो तो राधा रानी और उनकी सखियां मिलकर उनके सभी सखाओं को लट्ठ मारने लगी। भगवान कृष्ण और उनके सखा इस मस्ती भरी मार से बचने के लिए इधर उधर भागने लगते थे। बस तभी ये लट्ठमार होली की परंपरा चली आ रही है। इसी वजह से इसका नाम लट्ठमार होली भी पड़ा है। आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां लट्ठमार होली खेलने के लिए आते हैं।
दुनियाभर में प्रसिद्ध है लट्ठमार बोली
लट्ठमार होली बरसाना की रंगीली गली में खेली जाती है। इसे राधा कृष्ण प्रतीक स्थल माना जाता है। देश के अलग अलग कोने से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां होली खेलने के लिए पहुंचते हैं। बरसाने की यह लट्ठमार बोली अब केवल देश तक ही प्रसिद्ध नहीं है बल्कि विदेश से भी लोग इसका हिस्सा बनने के लिए यहां पहुंचते हैं। वहीं, लट्ठमार होले से ठीक एक दिन पहले बरसाने के श्रीजी मंदिर में लड्डू मार होली खेली जाती है। मथुरा वृंदावन की होली सिर्फ अबीर गुलाल तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह एक उत्सव के रुप में मनाई जाती है जो धुलंडी से एक हफ्ते पहले शुरू हो जाती है। लट्ठमार होली के मौके पर यहां लाठी भांजने यानी लाठी चलाने की प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।














