वृंदावन में मनाई जाती है फूलों वाली होली
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में फूलों वाली होली इस साल 28 फरवरी, शनिवार के दिन खेली जाएगी। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर सेवायत के द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह वह समय होता है जब राधा और कृष्ण के प्रेम की लीलाएं पूर्ण सौंदर्य के साथ प्रकट होती हैं। हालांकि, श्रीमद्भागवतम (दशम स्कंध) में आधुनिक रूप की होली का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं है, लेकिन वहां वसंत ऋतु में श्रीकृष्ण और गोपियों की विविध क्रीड़ाओं का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन देखने को मिलता है। बाद के वैष्णव ग्रंथों जैसे गीत गोविंद, गोविंद-लीलामृत और ब्रज की लोक परंपराओं में इन वसंत लीलाओं का अधिक विस्तार किया गया है। इन परंपराओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रंग गुलाल खेलते हैं। गोपियां भी पूरे उत्साह और आनंदपूर्वक इस पर्व को मनाती हैं। इसी तरह ब्रज की होली को भगवान के साथ आत्मीय प्रेम संबंध की अभिव्यक्ति मानी जाती है।
फूलों वाली होली की शुरुआत कैसे हुई
यह विशेष होली वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर, बरसाना, नंदगांव और विभिन्न वैष्णव मंदिरों में मनाई जाती है। यह परंपरा मंदिर-उपासना में एक सौम्य और भक्तिपूर्ण रूप में विकसित हुई, जहां रंगों के स्थान पर पुष्प-वर्षा की जाती है। फूल को वैष्णव उपासना में प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना गया है। देवताओं पर पुष्प-वर्षा करना दिव्य आनंद का संकेत होता है। ऐसी मान्यता है कि वसंत ऋतु में वृंदावन के कुंजों में राधा-कृष्ण पुष्पों के बीच क्रीड़ा करते थे। भक्त इसी आनंद का अनुभव करने के लिए फूलों वाली होली मनाते हैं।
कुछ कथाओं में ऐसा भी बताया गया है कि एक बार कृष्णजी और राधा रानी किसी कारणवश दूर हुए। तब राधा रानी इतनी दुखी हो गई थीं की इसका प्रभाव प्रकृति पर भी दिखने लगा। वृंदावन के सभी फूल मुरझाने लगे और पेड़-पौधों की हरियाली भी जाने लगी। जब श्रीकृष्णजी को इस बात का पता चला तो वह तुरंत वृंदावन गए और जैसे ही राधा रानी ने उनका मुख देखा तो उनकी खुशी से सारे फूल दोबारा खिल उठे। माना जाता है की तभी से फूलों वाली होली खेली जाती है।
बरसाने में मनाई जाती है लड्डू मार होली
लड्डू होली राधा रानी की जन्मभूमि बरसाना में मनाई जाती है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर सेवायत के द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, इसका संबंध लठमार होली से है। जहां परंपरागत रूप से नंदगांव के पुरुषों और बरसाना की महिलाओं के बीच हंसी-मजाक और प्रेमपूर्ण नोक-झोंक होती है। लड्डू मार होली में लाठियों की जगह लड्डू फेंके जाते हैं। इसे प्रेम और मिठास का प्रतीकात्मक आदान-प्रदान माना गया है।
क्यों मनाई जाती है लड्डू मार होली
मान्यता है की श्रीकृष्ण और उनके सखा नंदगांव से बरसाना आते थे। वे राधा रानी और सखियों से हंसी-मजाक किया करते थे। सखियां भी उन्हें प्रेमपूर्वक चिढ़ाती थीं। इसी प्रेमपूर्ण वातावरण में मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था और इसी भाव से लड्डू मार होली की परंपरा विकसित हुई। माना जाता है कि लड्डू मिठास का प्रतीक और दिव्य प्रेम की मधुरता का संकेत है। यह दर्शाता है कि राधा-कृष्ण की लीला में जो भी नोक-झोंक है वह अंततः प्रेम से भरा हुआ है। समय के साथ-साथ ब्रज की लोक परंपराएं मंदिरों और समाज में प्रतिष्ठित हुईं। ये उत्सव धूमधाम से मनाया जाने लगा और अब विश्वभर से श्रद्धालु इन लीलाओं का दर्शन करने आते हैं।













