सिंधुत्व सर्टिफिकेट जारी करने की मांग
अप्रैल 2018 में उन्होंने एक ऐसे आदमी से शादी कर ली, रिजर्वड कैटेगरी III-B से हैं। महिला तब से माता-पिता से अलग और अपने पति के साथ रह रही हैं। महिला ने सिविल जज की पोस्ट के लिए अप्लाई किया हुआ है, जिसमें 57 में से 6 पोस्ट कैटेगरी II-A के कैंडिडेट्स के लिए रिजर्व हैं। सिलेक्शन के बाद महिला ने अपने जाति सर्टिफिकेट के वेरिफिकेशन और अपने पति की इनकम के आधार पर ‘सिंधुत्व’ सर्टिफिकेट जारी करने की मांग की। जिला जाति और इनकम वेरिफिकेशन कमेटी ने यह कहते हुए उनकी एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी कि वह अपने माता-पिता की इनकम के हिसाब से क्रीमी लेयर में आती हैं।
पति की इनकम को लेकर दिया तर्क
महिला की मां कर्नाटक ज्यूडिशियल सर्विस से डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर रिटायर हुई थीं। उनके पिता असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट के तौर पर रिटायर हुए थे। इस पर जब महिला का केस कर्नाटक HC पहुंचा तो उन्होंने दलील दी कि एक शादीशुदा महिला की एलिजिबिलिटी उसके पति की इनकम के आधार पर तय होनी चाहिए, न कि उसके माता-पिता की इनकम के आधार पर। महिला ने तर्क दिया कि पति की सालाना इनकम उन्हें क्रीमी लेयर डिसक्वालिफिकेशन के दायरे से बाहर रखती है।
क्या माता-पिता की पेंशन इनकम मानी जाए?
कोर्ट में राज्य सरकार ने तर्क दिया कि माता-पिता की पेंशन पर भी विचार किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने महिला के दावे को खारिज करते हुए फैसला सुनाया कि उनके माता-पिता की पेंशन को भी परिवार की इनकम माना जाएगा। हाई कोर्ट का में बहस के दौरान सीनियर वकील संजय एम नूली ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच को तर्क दिए। उन्होंने कहा कि क्या शादीशुदा महिला कैंडिडेट की क्रीमी लेयर तय करने के लिए पति की इनकम या माता-पिता की इनकम पर विचार किया जाना चाहिए। अगर माता-पिता की इनकम पर विचार किया जाना है, तो क्या माता-पिता की पेंशन को इनकम माना जाना चाहिए या नहीं?
एक हफ्ते के अंदर देना होगा जवाब
सुनवाई के दौरान बेंच ने कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी किया और दो हफ्ते के अंदर अपील का जवाब देने को कहा। अपील करने वाले को एक हफ्ते में जवाब देने की इजाजत दी गई है और मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को तय की गई है।













