कमाई कम, खर्च अधिक:अगर मैं पुरुष होती, तो शायद सीधे मेट्रो लेती, लेकिन औरत होने की वजह से देर रात घर लौटना महंगा पड़ता है। हर बार 250–350 रुपये ज्यादा लगते हैं। यही सेफ्टी टैक्स है, जो महिलाएं सिर्फ सुरक्षित रहने के लिए चुकाती हैं। मुंबई में महिलाएं परिवहन पर पुरुषों से 21% ज्यादा खर्च करती हैं, फिर भी सिर्फ 35% ही सुरक्षित महसूस करती हैं। जब महिलाएं पहले ही पुरुषों के मुकाबले 40% कम कमा रही हैं, तब यह अतिरिक्त खर्च चुभता है। रोज के छोटे समझौते लंबे समय में बड़े नुकसान में बदल जाते हैं।
जीने का रास्ता: सेफ्टी टैक्स तय करता है कि औरतें शहर में कैसे जिएंगी। अर्थशास्त्री गिरिजा बोरकर की रिसर्च बताती है कि दिल्ली में महिलाएं सुरक्षा के लिए सालाना 18,800 रुपये अधिक खर्च करती हैं। इतना ही नहीं, अगर कॉलेज जाने का रास्ता सुरक्षित है तो वे कम गुणवत्ता वाले कॉलेज भी चुन लेती हैं। हर दिन महिलाएं घर से निकलने से पहले सोचती हैं कि कब तक पहुंच पाऊंगी, क्या रास्ता सुरक्षित है और अगर कुछ हुआ तो किसे फोन करूंगी?
सेफ्टी टैक्स का असर
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट में 56% महिलाएं झेलती हैं उत्पीड़न
- सुरक्षित महसूस करने के लिए कैब-ऑटो का सहारा
- बचत पर असर, करियर में तरक्की के मौके कम
समानांतर व्यवस्था: देश की आधी आबादी को समय की भी कीमत चुकानी पड़ती है। महिलाएं आखिरी सुरक्षित बस या ट्रेन पकड़ने के लिए जल्दी निकलती हैं, देर शाम किसी कार्यक्रम में नहीं जातीं, लेकिन घर आने के लिए लंबा रास्ता तय करती हैं। धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है और उनके अवसर सीमित होते जाते हैं। यह कमजोरी नहीं, बल्कि एक समानांतर व्यवस्था है, जो महिलाओं ने इसलिए बनाई क्योंकि ऑफिशियल सिस्टम में वे सुरक्षित महसूस नहीं करतीं।
पूरी जिंदगी पर असर: नौकरी में भी यही होता है। कई बार प्रमोशन के मौके गंवा देती हैं। हर बार अवसर गंवाने से उनकी आमदनी ही कम नहीं होती, आगे की कमाई और बचत भी प्रभावित होती है। कम सैलरी से नौकरी की शुरुआत का असर पूरी जिंदगी पर पड़ता है। अगर कम कमाई है, तो बचत कम होगी और रिटायरमेंट तक कुल कमाई नाकाफी रहेगी।
उत्पीड़न आम बात: सेफ्टी टैक्स इसलिए भी है, क्योंकि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में उत्पीड़न आम है। पिछले साल दिल्ली की 90% से ज्यादा महिलाओं ने उत्पीड़न का अनुभव किया। इसमें 51% अनुभव पब्लिक ट्रांसपोर्ट के हैं। मुंबई में 46% ने बस और 17% ने ट्रेन में, लखनऊ में 88% ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सेक्सुअल कमेंट्स की रिपोर्ट की। बेंगलुरु में तीन में से दो महिला यात्री रोजाना हैरेसमेंट का शिकार होती हैं। पूरे देश में 56% महिलाएं यह अनुभव करती हैं, लेकिन सिर्फ 2% ही शिकायत दर्ज कराती हैं।
बढ़ सकती है GDP: भारत में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 24% है, जबकि दुनिया में औसत है 47%। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट के मुताबिक, जेंडर पैरिटी बढ़ाने से भारत की GDP में 770 अरब डॉलर जुड़ सकते हैं। यह सिर्फ दावा नहीं, हकीकत है। कमाई न होने पर टैक्स नहीं वसूला जाता, कंजंप्शन कम होता है, स्किल्स का इस्तेमाल नहीं होता, इनोवेशन प्रभावित होता है। रिसर्च बताती है कि ट्रांसपोर्ट एक्सेस और महिलाओं की नौकरी में जुड़ाव उनकी सुरक्षा पर निर्भर है। जहां हैरेसमेंट ज्यादा है, वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार का असर कम होता है।
फ्री बस नाकाफी: दिल्ली में पिंक टिकट और कर्नाटक की शक्ति स्कीम से महिलाओं का बस का सफर बढ़ा है। कर्नाटक में रोजाना 15 से 18 लाख महिलाएं सफर करती हैं, तमिलनाडु में बस इस्तेमाल बढ़ने से हर महीने 800-1000 रुपये बचते हैं। लेकिन, किराया नहीं लगना सिर्फ एक बाधा दूर करता है। महिलाएं अब भी भीड़, हैरेसमेंट और असुरक्षा का सामना करती हैं। भारत में बस रेश्यो बहुत कम है, इसलिए भीड़ और हैरेसमेंट का खतरा रहता है। ऐसे में महिलाएं महंगे सुरक्षित विकल्प चुनती हैं।
सुधार की जरूरत: सेफ्टी टैक्स खत्म करने के लिए बड़े बदलाव जरूरी हैं। हैरेसमेंट पर जीरो टॉलरेंस, ट्रांसपोर्ट स्टाफ और पुलिस का जेंडर सेंसिटाइजेशन, प्लानिंग और ऑपरेशंस में महिलाओं की हिस्सेदारी, पर्याप्त बसें, सुरक्षित फर्स्ट और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी के साथ विक्टिम सपोर्ट सिस्टम बनाना होगा। हर सफर के लिए अतिरिक्त पैसा खर्च करना, लंबा सफर या जॉब छोड़ने से देश की GDP और इनोवेशन पर असर पड़ रहा है। सेफ पब्लिक ट्रांसपोर्ट महिलाओं को शहर में बिना डर और एक्स्ट्रा खर्च के घूमने का हक देता है। जब तक यह नहीं होता, लाखों महिलाएं रोजाना आर्थिक और समय का नुकसान उठाती रहेंगी। यह सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं, भारत के विकास और आर्थिक समझदारी का मसला है।
(लेखिका मीडिया कंसल्टेंसी फर्म में रिसर्च असोसिएट हैं)













