होलिका का इलोजी से तय हुआ था विवाह
पौराणिक कथा के अनुसार, होलिका हिरण्यकश्यप की बहन थी और हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। होलिका का विवाह इलोजी के साथ तय किया गया था और दोनों एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका का विवाह तय हुआ था। लेकिन इस पूर्णिमा के दिन कुछ ऐसा हुआ की होलिका की प्रेम कथा अधूरी रह गई। दरअसल, हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद से बहुत परेशान था। उसने कई प्रयास करे ताकि प्रह्लाद विष्णुजी की भक्ति करना छोड़ दे। लेकिन प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था। ऐसे में कई प्रयास करने के बाद भी हिरण्यकश्यप को अपनी हर योजना में हार का सामना करना पड़ा। इसलिए हिरण्यकश्यप ने फैसला किया कि वह अपने बेटे की बलि देगा।
हिरण्यकश्यप की धमकी के आगे होलिका हुई बेबस
होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। ऐसे में हिरण्यकश्यप ने योजना बनाई और उसके बारे में होलिका को बताया। होलिका को दुशाला के साथ अपने भतीजे प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठने को कहा गया था। यह योजना सुनकर होलिका ने इंकार कर दिया की वह ऐसा न करेगी। कई बार करने पर भी होलिका ने मना कर दिया। ऐसे में हिरण्यकश्यप ने विवाह में बाधा और इलोजी को मारने की धमकी दे दी। हिरण्यकश्यप ने कहा- पहले तुम प्रह्लाद को लेकर हवन कुंड में बैठ जाओ फिर इलोजी से विवाह कर लेना। धमकी के बाद मजबूर होकर होलिका को यह बात माननी पड़ी। इसके बाद, प्रह्लाद को लेकर विवाह वाले दिन यानी पूर्णिमा तिथि पर हवन कुंड में बैठने की योजना बनाई गई। इलोजी इन सभी बातों से अंजान था और अपनी बारात लेकर वह फाल्गुन पूर्णिमा को रात में बारात लेकर निकल गया।
अग्नि में भस्म हुई होलिका, इलोजी ने खोया सुध बुध
पूर्णिमा तिथि पर होलिका दुशाला के साथ प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर हवन कुंड में बैठ गई। तभी अचानक से ऐसी हवा चली की दुशाला प्रह्लाद के पास पहुंच गई और होलिका जलकर भस्म हो गई। ऐसे में विष्णुजी के भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गए। वहीं, बारात लेकर पहुंचे इलोजी ने जब अपनी आंखों से सामने यह घटना होते हुए देखी तो वह उसने अपना सुधबुध खो दिया और सबकुछ छोड़कर वन में चला गया।














