दामाद की पहली होली ससुराल में मनाना भी विशेष महत्व रखता है। दामाद के स्वागत में होली के अवसर पर विशेष पकवान बनाए जाते हैं, हंसी-ठठेली होती है, रिश्तो में आत्मीयता आती है, पति-पत्नी के बीच कुछ दिनों की दूरी प्रेम को और प्रगाढ़ बना देती है, पुनर्मिलन का आनंद रिश्तो में नई ताजगी भर देता है। पुराने समय में परिवहन की सुविधा सीमित थी और बेटियों को मायके आना-जाना कम हो पता था, इसलिए भी त्योहार के अवसर पर उन्हें बुलाने की परंपराएं विकसित होती चली गई।
पौराणिक संदर्भों पर ध्यान दे तो, हम लोगों ने बचपन से ही होलिका दहन की प्रसिद्ध कथाएं सुनी हैं, जिसमें प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान समझते थे और वह चाहते थे कि उनकी प्रजा उन्हें भगवान की तरह पूजे। परंतु ईश्वर की ऐसी लीला हुई की हिरण्यकश्यप के घर में विष्णु भगवान का भक्त प्रहलाद के रूप में जन्मा। प्रहलाद को बहुत समझाया गया कि अपने पिता को भगवान माने, परन्तु उसने मानने से इन्कार कर दिया, तो उसे कई बार मृत्यु की गोद में भेजने का प्रयास किया गया, ईश्वर की कृपा से हर बार प्रहलाद बच जाता था।
दुल्हन पहली होली मायके में क्यों मानती है?
कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से सहायता ली जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। कहीं-कहीं पर यह भी वर्णन आता है कि होलिका के पास एक दिव्य वस्त्र था जिसे वह जब ओढ़कर अग्नि में बैठती थी तो अग्नि उसे जला नहीं पाती थी। कहा जाता है, ईश्वर की ऐसी लीला हुई कि वह दिव्य वस्त्र उड़कर प्रहलाद पर आ गिरा और होलिका स्वयं जल के भस्म हो गई। इसके बाद कहा जाता है कि जिस दिन होलिका जलकर भस्म हुई थी उस दिन उसका विवाह होना था। जब बारात पहुंची तो वधू होलिका की चिता जलते देखा तो शोक एवं मातम छा गया। तभी से यह मान्यता बनी कि नई बहू को पहली होली ससुराल में नहीं मनानी चाहिए अन्यथा अशुभ फल हो सकता है। होलाष्टक से पहले नई नवेली दुलहन अपने मायके पहुंच जाती है तथा होली उत्सव सम्पन्न होने के बाद ही पति के साथ वापस ससुराल आती है।














