डायबिटीज में इस्तेमाल होने वाली इंसुलिन, कैंसर की कई दवाइयां, कोविड जैसे रोगों के टेस्ट, मेडिकल जांच किट, रिसर्च लैब, खेती में काम आने वाले एंजाइम और यहां तक कि कपड़े धोने के डिटर्जेंट, इन सभी में किसी न किसी रूप में प्रोटीन का इस्तेमाल होता है। यानी अगर प्रोटीन सस्ते बनेंगे, तो इन सबकी कीमत भी कम हो सकती है।
प्रोटीन बनाने की लागत 40% तक कम हुई
आमतौर पर प्रोटीन बनाने के लिए जीवित कोशिकाओं को पालना पड़ता है, जिसमें काफी समय और पैसा लगता है। लेकिन GPT-5 ने Ginkgo Bioworks नाम की कंपनी के साथ मिलकर सेल-फ्री प्रोटीन सिंथेसिस (CFPS) नाम की तकनीक को ज्यादा किफायती बना दिया। इस नई प्रक्रिया से प्रोटीन बनाने की कुल लागत करीब 40% तक कम हो गई है, जबकि इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स की कीमत में 57% तक की गिरावट आई है।
यानी, CFPS तकनीक से जीवित कोशिकाओं को उगाने की बजाय सीधे प्रोटीन बनाने वाली मशीनरी का इस्तेमाल किया गया। GPT-5 ने केवल 3 राउंड में यह समाधान खोज लिया। इस खोज के लिए AI मॉडल को कंप्यूटर, ब्राउजर और कुछ रिसर्च पेपर्स तक का एक्सेस दिया गया था। इसके बाद AI ने तय किया कि अगला प्रयोग क्या होना चाहिए और क्लाउड लैब में रोबॉट्स ने 580 प्लेट्स पर 36 हजार से ज्यादा प्रयोग करके इस खोज को सबके सामने रखा।
आम आदमी को इससे क्या फायदा होगा?
- सबसे बड़ा असर दवाइयों की कीमत पर पड़ेगा। इंसुलिन, कैंसर और दूसरी आधुनिक बायोलॉजिकल दवाइयां सस्ती बन सकेंगी, जिससे इलाज ज्यादा लोगों की पहुंच में आ पाएगा।
- दूसरा फायदा, मेडिकल टेस्ट और डायग्नोस्टिक किट्स में दिखेगा। जब प्रोटीन सस्ते होंगे, तो जांच भी सस्ती होगी। इससे छोटे शहरों और गांवों तक बेहतर और किफायती मेडिकल टेस्ट पहुंच सकेंगे।
- तीसरा फायदा, इंडस्ट्री और पर्यावरण से जुड़ा है। कई फैक्ट्रियां अब केमिकल्स की जगह एंजाइम का इस्तेमाल करती हैं, जो पर्यावरण के लिए ज्यादा सुरक्षित होते हैं। अगर ये एंजाइम सस्ते होंगे, तो प्रदूषण कम करने वाली तकनीकें भी आम हो सकेंगी।
- इस खोज का एक और बड़ा मतलब यह है कि भविष्य में रिसर्च की रफ्तार तेज होगी। जब वैज्ञानिकों को हर प्रयोग पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ेगा, तो वे ज्यादा नए आइडिया आजमा पाएंगे। इसका सीधा फायदा समाज को नई दवाओं, बेहतर इलाज और सस्ते उत्पादों के रूप में मिलेगा।













