फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के शासन के 18 महीने जमात के लिए किसी सपने के पूरे होने जैसा है। मोहम्मद यूनुस ने पद संभालने के बाद जमात-ए-इस्लामी पर से बैन हटा दिया था। इससे पार्टी को अपने कट्टर रूढ़िवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने और देश की राजनीति में जगह बनाने का रास्ता मिल गया।
जमात ने बना ली अपनी पैठ
शेख हसीना के हटने के बाद जमात बिना किसी रोक-टोक के काम कर रही है। जमात का कैडर और नेता अंतरिम सरकार के सभी लेवल पर अपनी जगह बना चुके हैं। बीइंग हिंदू इन बांग्लादेश: द अनटोल्ड स्टोरी और इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के लेखक दीप हलदर का कहना है कि जमात ने असल में एक तरह का डीप स्टेट बनाया है।
हलदर ने फर्स्टपोस्ट से कहा, ‘यूनुस के राज में जमात ने सरकारी संस्थाओं में अपनी जगह बना ली है। यूनुस ने अवामी लीग के हटने के बाद खुलकर जमात को बढ़ावा दिया गया। जमात इस मौका का फायदा उठाकर जमीन पर एक ताकत बन गई है। स्थिति ऐसी है कि BNP सरकार बना ले तो भी जमात सरकारी मशीनरी पर कब्जे की वजह से बड़ी ताकत बनी रहेगी।’
अवामी लीग के वोटर्स में जमात की पकड़
कम्युनिकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के एक सर्वे के मुताबिक, अवामी लीग के 48.2 परसेंट वोटर BNP को और 29.9 परसेंट जमात को वोट देंगे। इस आंकड़े पर हलदर कहते हैं, ‘आम सोच के उलट बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथ निचले तबके की समस्या नहीं है। बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग जमात के मेंबर और लीडर हैं। यूनुस के एडमिनिस्ट्रेशन ने चुपचाप इन ग्रुप्स को ताकत दी है।’
जमात के बारे में यह भी समझना चाहिए कि यह BNP याअवामी लीग जैसी कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है। यह एक ट्रांसनेशनल इस्लामी आंदोलन है, जो शरिया से चलने वाला देश बनाने पर काम करता है। जमात चुनाव लड़ रही है लेकिन वह सेक्युलरिज्मऔर डेमोक्रेसी की जगह इस्लामी कानून की हामी है।
जमात से बढ़ेगी भारत की चिंता
थिंक टैंक उसानास फाउंडेशन का कहना है कि जमात कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है। यह पाकिस्तान में मौजूद एक ट्रांसनेशनल इस्लामी मूवमेंट है, जो जिहादी ग्रुप्स के लिए एक फ्रंट के तौर पर काम करता है। जमात जब बीएनपी के साथ सत्ता में थी तो पाकिस्तानी जिहादियों के भारत आने को यहां से रास्ता मिला। जमात की बढ़ती ताकत फिर से ऐसी गतिविधियों का अंदेशा बढ़ाती है।













