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  • Basoda 2026 Kab Hai : शीतलाष्टमी बसौड़ा पूजन की तिथि मुहूर्त जानें विस्तार से, इस दिन बासी भोजन करने की है मान्यता

    बसौड़ा का पर्व हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है। उन्हें बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इसलिए इसे शीतला अष्टमी भी कहा जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है। आमतौर पर होली से आठ


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    By Azad Hind Desk फरवरी 18, 2026
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    बसौड़ा का पर्व हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है। उन्हें बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इसलिए इसे शीतला अष्टमी भी कहा जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है। आमतौर पर होली से आठ दिन बाद यह त्योहार पड़ता है। लेकिन, कई लोग इसे बोले के बाह पहले सोमवार या शुक्रवार को भी मनाते हैं। आइए जानते हैं इस बार कब की जाएगी बसौड़ा पूजा।

    कब है बसौड़ा 2026 ? ( Basoda 2026 Kab Hai )

    शीतला माता की पूजा देश के अलग अलग भागों में अलग-अलग दिन होती है। कई क्षेत्रों में शीतला सप्तमी बसौड़ा का पर्व चैत्र कृष्ण सप्तमी को मनाया जाता है जो अबकी बार 10 मार्च को है। लेकिन जहां शीतला अष्टमी का पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है वहां 11 मार्च को शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। बता दें कि मुख्य रुप से बसौड़ा उत्तर प्रदेश,बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य में मनाया जाता है। बता दें कि बसौड़ा सर्दी की समाप्ति और गर्मी के आरंभ का प्रतीक है। गर्मी का आरंभ होते ही त्वचा रोग आदि शुरु हो जाते हैं इसलिए उनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला की पूजा की जाती है। विशेष रुप से छोटे बच्चों के लिए यह पूजा की जाती है।

    बसोड़ा 2025 पूजा विधि (Basoda 2025 Puja Vidhi)

    1) बसोड़ा पूजा से एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को शाम के समय अपने रसोई घर की अच्छे से साफ सफाई करके भोजन बना लें। माता शीतला को बासी खाने का ही भोग लगाया जाता है। इस दिन माता के भोग में मुख्य रुप से दही, रबड़ी, चावल, हलवा, पूड़ी आदि बनाकर माता को भोग लगाया जाता है। इसके बाद बड़े बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।

    2) सबसे पहले शीतला माता को रोली का तिलक लगाएं और फिर उन्हें काजल, वस्त्र आदि ,सभी सामान अर्पित कर दें।

    3) इसके बाद माता शीतला की कथा का पाठ करें और फिर उन्हें बासी चीजों का भोग लगाएं।

    4) अंत में सभी को प्रसाद बांटे और खुद भी इसका सेवन करें।

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