23 जनवरी, शुक्रवार को बसंत पंचमी और जुमे की नमाज पड़ने को लेकर फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। हिंदुओं ने कोर्ट से इस दिन पूजा करने की इजाजत और मुसलमानों को वहां प्रवेश करने से रोकने की मांग की है। 22 जनवरी को इस मामले पर कोर्ट में सुनवाई के लिए राजी हो गया है। फिलहाल भोजशाला पर दोनों पक्षों का कब्जा है। भारत पुरातत्व सर्वेक्षण ने हिंदू पक्ष के लोगों को मंगलवार और वसंत पंचमी के दिन मंदिर में पूजा करने की अनुमति दी है, जबकि मुस्लिम पक्ष के लोग शुक्रवार को यहां नमाज अदा करते हैं।
भोजशाला का क्या है रहस्य?
भोजशाला का इतिहास 11वीं सदी का बताया जाता है। माना जाता है कि, परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने 1000–1055 ईस्वी में यहां ज्ञान और विद्या का केंद्र स्थापित किया। इसी केंद्र को भोजशाला के नाम से जाना जाता है। जहां शास्त्र, भाषा, संस्कृति और संगीत सहित अनेक विषयों पर अध्ययन होते थे। राजा भोज के शासन काल में ही यहां पर देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित की गई थी। जिसे वाग्देवी कहा जाता था। बाद में मुस्लिम शासक ने इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था। भोजशाला में मंदिर के अवशेष आज भी वहां दिखते हैं।
वाग्देवी का कैसा है स्वरूप?
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार देवी सरस्वती को वाग्देवी और ब्रह्मस्वरूपा कहा गया है। उन्हें कामधेनु के समान सर्वस्व प्रदान करने वाली माना गया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी के स्वरूप का वर्णन मिलता है। इसमें उन्हें चार भुजाओं वाली देवी बताया गया है, जो सुंदर आभूषणों से अलंकृत हैं। यह रूप ज्ञान, कला और सृजन का प्रतीक माना गया है। स्कंद पुराण में मां सरस्वती को जटा-जूट धारण किए हुए और मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित और कमल के आसन पर विराजमान बताया गया है।
सरस्वती पूजा का महत्व
मान्यता है कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण इस दिन को वसंत पंचमी कहा जाता है। इस दिन को देवी सरस्वती की पूजा और आराधना के लिए सबसे पावन माना जाता है। इस दिन छात्र, विद्वान और कला से जुड़े लोग विशेष रूप से देवी सरस्वती की उपासना करते हैं और ज्ञान व बुद्धि की कामना करते हैं।













