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  • BNP ने भारत-विरोधी पाकिस्तानी ताकतों से मिलाया हाथ, बांग्लादेश चुनाव से पहले तारिक रहमान बेनकाब

    नई दिल्ली: बांग्लादेश चुनाव से पहले तारिक रहमान ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता चुनाव के लिए ही अपने देश लौटे हैं। उन्होंने जिस तरह से सब कुछ जानते हुए ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) जनरल अमन आजमी से मुलाकात की है, उससे उनकी भारत को लेकर रणनीति पर


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    By Azad Hind Desk जनवरी 16, 2026
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    नई दिल्ली: बांग्लादेश चुनाव से पहले तारिक रहमान ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता चुनाव के लिए ही अपने देश लौटे हैं। उन्होंने जिस तरह से सब कुछ जानते हुए ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) जनरल अमन आजमी से मुलाकात की है, उससे उनकी भारत को लेकर रणनीति पर संदेह गहरा गया है। क्योंकि, आजमी की पैदाइश ही भारत-विरोधी मानसिकता वाले परिवार में हुई है। यह पाकिस्तान के इशारे पर काम करने वाला बांग्लादेश का पूर्व सेना अधिकारी है और इसी वजह से शेख हसीना के शासन काल में यह बांग्लादेश में नजर भी नहीं आता था। जब से अवामी लीग की सरकार गिरी है, आजमी अपना भारत-विरोधी मंसूबे को फिर से पूरा करने में जुट चुका है।

    अमन आजमी से मिले तारिक रहमान

    बीएनपी अध्यक्ष और बांग्लादेश की पूर्व पीएम खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान का चुनाव से पहले अचानक ब्रिगेडियर जनरल (रिटायर्ड) अमन आजमी से मुलाकात सामान्य नहीं है। ET की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह मुलाकात बुधवार शाम को ढाका में हुई। इस वजह से चुनाव में जीत के बाद बीएनपी का भविष्य में पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई से तालमेल को लेकर संदेह गहरा गया है। जब खालिदा जिया के निधन के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ढाका में रहमान से मिले थे तो उन्होंने सत्ता में आने के बाद भारत से सकारात्मक रिश्ते का संदेश दिया था। लेकिन, उनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का फर्क अभी से दिखाई पड़ने लगा है।

    कौन है ब्रिगेडियर जनरल अमन आजमी

    अमन आजमी बांग्लादेश के जमात-ए-इस्लामी के नेता गुलाम आजम का बेटा है। यह अपने पूरे करियर में भारत विरोध और पाकिस्तान से नजदीकियों की वजह से कुख्यात रहा है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन में गुलाम आजम जमात का अगुवा नेता था। इसने बांग्लादेश की आजादी का खुलकर विरोध किया था और पाकिस्तानी फौज के साथ मिलकर पाकिस्तान समर्थित पीस कमेटियां बनाई थीं। यह कमेटियां अपनी क्रूरता के लिए इतिहास में दर्ज हैं। इसने राजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसी मिलिशिया बनाई थी, जो हजारों बांग्लादेशियों के नरसंहार, युद्ध अपराध और बुद्धिजीवियों के कत्लेआम का जिम्मेदार रहा है।

    तारिक रहमान का रवैया संदिग्ध रहा है

    पिछले साल जब नए अवतार में तारिक रहमान बांग्लादेश लौटे तो उन्होंने चुनाव में जीतकर प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के साथ सामान्य रिश्ते स्थापित करने का संकेत दिया था। लेकिन, बांग्लादेश की राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि रहमान का जो आईएसआई और जमात-ए-इस्लामी के साथ पुराने ताल्लुकात रहे हैं, उसके प्रभाव में वह अगर भारत-विरोधी रुख की ओर मुड़ जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। इनका कहना है कि पाकिस्तान समर्थक जमात हर हाल में संभावित बीएनपी सरकार में शामिल होने के लिए उतावला है, ताकि वह अपना एजेंडा आगे बढ़ा सके जो 1971 से ही दबा पड़ा रहा है।

    बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी का रोल

    जमात-ए-इस्लामी के नेता गुलाम आजम को 1971 के युद्ध अपराधों और मानवता के प्रति अपराध के लिए बांग्लादेश इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल ने 90 साल की सजा सुनाई थी। तब उसकी उम्र (2013 में 91 साल) को देखते हुए उसे फांसी की सजा से राहत दी गई थी। उसकी मौत 2014 में हो गई।

    शेख हसीना सरकार में जमात-ए-इस्लामी

    बांग्लादेश की सत्ता में जबतक अवामी लीग का प्रभाव रहा जमात-ए-इस्लामी की नकेल कसी रही। 2024 में शेख हसीना को सरकार से जबरदस्ती बेदखल करने में भी जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन की ही भूमिका सामने आई थी। जबतक बांग्लादेश में हसीना पीएम रहीं, अमन आजमी गायब था। जैसे ही वह देश छोड़कर भारत आईं और मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर सत्ता में बैठने का मौका मिला, आजमी फिर से सक्रिय हो गया। बांग्लादेश की राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगस्त 2024 के बाद से कथित अपहरण और हत्याओं में जिस तरह से कई वरिष्ठ आर्मी अधिकारियों पर केस दर्ज हुए हैं, उसमें भी इसका रोल सबसे अहम रहा है।

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