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  • Chanakya Niti: 100 पुत्रों से अच्छा एक पुत्र… आचार्य चाणक्य ने चांद-तारों से क्यों की संतान की तुलना

    Chanakya Niti in Hindi : आचार्य चाणक्य एक महान शिक्षक और अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ एक कूटनीतिज्ञ भी थे। चाणक्य अपनी चतुर रणनीतियों की वजह से प्रसिद्ध थे। आचार्य चाणक्य की नीतियों का आज भी अनुसरण किया जाते हैं। अपनी चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य ने जीवन के हर पहलू का बेहद ही बारीकी से


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    By Azad Hind Desk फरवरी 19, 2026
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    Chanakya Niti in Hindi : आचार्य चाणक्य एक महान शिक्षक और अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ एक कूटनीतिज्ञ भी थे। चाणक्य अपनी चतुर रणनीतियों की वजह से प्रसिद्ध थे। आचार्य चाणक्य की नीतियों का आज भी अनुसरण किया जाते हैं। अपनी चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य ने जीवन के हर पहलू का बेहद ही बारीकी से समझाया है। आचार्य ने अपने एक श्लोक में पुत्रों की तुलना चांद और तारों से की है। आइए जानते हैं कि आचार्य इसके माध्यम से क्या कहना चाहते हैं।

    वरमेको गुणी पुत्रो निर्ग्रणैश्च शतैरपि।
    एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्त्रशः।।

    आचार्य चाणक्य का मानना है कि सैकड़ों गुणरहित और मूर्ख पुत्रों के बजाय एक गुणवान और विद्वान पुत्र का होना अच्छा है। उनका कहना है कि जैसे हजारों तारों के मुकाबले एक अकेले चंद्रमा से ही रात प्रकाशित होती है। ठीक उसी प्रकार सैकड़ों मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक विद्वान और गुणों से युक्त पुत्र से ही पूरे परिवार का कल्याण होता है।

    इस श्लोक के माध्यम से आचार्य का कहना है कि रात के समय जिस प्रकार आकाश में हजारों तारे दिखाई देते हैं, लेकिन उनसे रात का अंधकार दूर नहीं होता। रात का अंधेरा सिर्फ चंद्रमा के उगने से ही दूर हो पाता है। आचार्य की दृष्टि में संख्या से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का गुण है।

    मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः।
    मृतः स चाऽल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ।।

    आचार्य चाणक्य ने लंबी आयु वाले मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही मर जाने वाले पुत्र को अधिक श्रेष्ठ माना है। आचार्य ने अपने श्लोक के माध्य से बताया है कि पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र थोड़े समय के लिए ही दुख का कारण होता है, जबकि लंबी आयु वाला मूर्ख पुत्र मृत्यु तक दुख देता रहता है।

    आचार्य का कहना है कि संतान से माता-पिता की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। जब जन्म लेते ही संतान की मृत्यु हो जाती है, तो माता-पिता निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं। भविष्य में इस मृत संतान को लेकर कोई सुख-दुख की उम्मीद नहीं रहती है। जबकि मूर्ख जीवित पुत्र नित्य-प्रति अपने माता-पिता की आशा के टुकड़े-टुकड़े करता रहता है। इस दुख से पहला दुख ज्यादा ठीक है।

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