चंद्र ग्रहण कब लगता है?
वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रग्रहण बेहद महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है। पृथ्वी के चारों तरफ चंद्रमा चक्कर लगाता है, जबकि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है। सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी के आने से चंद्रग्रहण लगता है। इस घटना के दौरान सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाती और पृथ्वी की छाया चंद्रमा को ढक देती है। इसे ही चंद्रग्रहण कहा जाता है। चंद्रग्रहण मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं- पूर्ण चंद्रग्रहण, आंशिक चंद्रग्रहण और उपच्छाया चंद्रग्रहण।
पूर्ण, आंशिक और उपच्छाया चंद्रग्रहण में अंतर
| चंद्र ग्रहण का प्रकार | चंद्रमा का रूप |
| पूर्ण चंद्र ग्रहण | पूरी तरह छिपा हुआ (इसे ब्लड मून कहा जाता है) |
| आंशिक चंद्र ग्रहण | आधा छिपा हुआ (कुछ भाग सफेद और कुछ काला) |
| उपच्छाया चंद्र ग्रहण | हल्का धुंधला (सामान्य आंखों से देखना मुश्किल) |
पूर्ण चंद्र ग्रहण
पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है। जिससे सूर्य की रोशनी पूरी तरह से चंद्रमा से कट जाती है। जब चंद्रमा पृथ्वी की गहरी छाया (उम्ब्रा) से होकर गुजरता है तो उसे पूर्ण चंद्र ग्रहण कहते हैं।
ब्लड मून
ब्लड मून पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान ही देखी जाने वाली घटना है। सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं। ऐसे में पृथ्वी के वायुमंडल से छनकर आने वाली सूर्य की रोशनी के कारण चंद्रमा लाल रंग का नजर आता है।
आंशिक चंद्र ग्रहण
चंद्र ग्रहण का दूसरा प्रकार आंशिक चंद्र ग्रहण होता है। आंशिक चंद्र ग्रहण के दौरान पृथ्वी की छाया (उम्ब्रा) का सिर्फ एक हिस्सा ही चंद्रमा पर पड़ता है। इससे चंद्रमा का कुछ हिस्सा छिप जाता है और कुछ दिखाई देता है। इसे ही आंशिक चंद्र ग्रहण कहते हैं।
उपच्छाया चंद्र ग्रहण
चंद्र ग्रहण का तीसरा प्रकार उपच्छाया चंद्र ग्रहण होता है। चंद्रमा जब पृथ्वी की हल्की छाया (पेनम्ब्रा) से होकर गुजरता है तो उसे उपछाया चंद्रग्रहण कहते हैं। इसमें चंद्रमा सामान्य से हल्का धुंधला नजर आता है। इसे सामान्य आंखों से देख पाना लगभग मुश्किल होता है।














